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________________ २१८ श्रावकप्रज्ञप्तिः [ ३६४ - इत्थं चिन्तयतो वैराग्यं भवत्यनुभवसिद्धमेवैतत् । तथा कर्मक्षयः तत्वचिन्तनेन, प्रतिपक्षत्वात् । विशुद्धज्ञानं च, निबन्धनहानेः । चरणपरिणामः, प्रशस्ताध्यवसायत्वात् । स्थिरता धर्मे, प्रतिपक्षासारदर्शनात् । आयुरिति कदाचित्परभवायुष्कबन्धस्ततस्तच्छुभत्वात्सवं कल्याणम् । बोधिरित्थं तत्वभावनाभ्यासादेवं चिन्तायां क्रियमाणायां गुणा भवन्त्येवं चिन्तया वेति ॥३६३॥ गोसम्मि पुव्वभणिओ नवकारेणं विबोहमाईओ। इत्थ विही गमणम्मि य समासओ संपवक्खामि ॥३६४॥ गोसे प्रत्यूषसि पूर्वभणितो नमस्कारेण विबोधादिः । अत्र विधिः ( इति ) गमने च समासतः संप्रवक्ष्यामि ॥ विधिमिति ॥३६४॥ अहिगरणखामणं खलु चेइय-साहूण वंदणं चेव । संदेसम्मि विभासा जइ-गिहि-गुण-दोसविक्खाए ॥३६५॥ अधिकरणक्षामणं खलु माभूत्तत्र मरणादौ वैरानुबन्ध इति । तथा चैत्य-साधूनामेव च वन्दनं नियमतः कुर्यात्, गुणदर्शनात् । संदेशे विभाषा यति-गृहिगुण-दोषापेक्षयेति । यतेः संदेशको नीयते, न सावधो गृहस्थस्य इति ॥३६५॥ चैत्य-साधूनां वन्दनं चेति यदुक्तं तद्विस्फारयति साहूण सावगाण य सामायारी विहारकालंमि । जत्थरिथ चेइयाइं वंदावंती तहिं संघं ॥३६६॥ . वैराग्य, कर्मोंका क्षय, निर्मल ज्ञान, चारित्रको ओर परिणति, धर्ममें स्थिरता, आयुपरभविक शुभ आयुका बन्ध और रत्नत्रय बोधिकी प्राप्ति ये उसके गुण हैं-उस चिन्तनसे होनेवाला यह एक बड़ा भारी लाभ है ॥३६३॥ आगे पूर्वप्ररूपित प्रातःकालीन विधिको ओर संकेत करते हुए संक्षेपमें गमनविषयक विधिके निरूपणकी प्रतिज्ञा करते हैं प्रातःकालमें पंचनमस्कारमन्त्रके उच्चारणके साथ उठते हुए जो क्रिया की जानी चाहिए उसका निरूपण किया जा चुका है। अब यहां संक्षेपसे अन्यत्र जानेसे सम्बन्धित विधिका कथन करता हूँ ॥३६४॥ अब अन्यत्र जाते समय प्रारम्भमें क्या करे, इसका निर्देश किया जाता है अन्यत्र जाते समय मरणके समय वैरको परम्परा न चले, इस उद्देश्यसे जिनके साथ वरविरोध रहा है उनसे क्षमा करे-करावे तथा चैत्य व साधुओंकी वन्दना भी करना चाहिए। यति और गृहस्थके गुण-दोषको अपेक्षा सन्देशके विषयमें विकल्प है-यतिका सन्देश निर्दोष होनेसे ले जानेके योग्य है, किन्तु गृहस्थका वह सदोष होनेसे ले जानेके योग्य नहीं है ॥३६५॥ आगे चैत्य व साधुओंकी वन्दनाके विषयमें जो पूर्वमें निर्देश किया गया है उसका स्पष्टीकरण अगली चार ( ३६६-३६९ ) गाथाओं द्वारा किया जाता है१. अ म गोसे (प्रत्युषसि) । २. अ विधि धरिति । ३. अ वंदावितं ।
SR No.022026
Book TitleSavay Pannatti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHaribhadrasuri, Balchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages306
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size31 MB
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