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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir Achar नय-वाद जो गहइ एक्कसमए उप्पाय-वय- वत्तसंजुत्तं । ४ सो सम्भाव अणिच्चो असुद्धओ पज्जयत्यीओ ॥ २४ ॥ ३० देहीणं पज्जाया सुद्धा सिद्धाण भणइ सारिच्छा । ५ जो इह अणिच्चसुद्धो पज्जयगाही हवे स णओ ॥ २५ ॥ ३१ भणइ अणिचासुद्धा चउगइजीवाण पजया जो हु । ६ होइ विभाव-अणिच्चो असुद्धओ पजयत्थिणओ ॥ २६ ॥ ३२ १ नैगम णिब्वित्त-दव्व-किरिया वट्टणकाले दु जं समाचरणं । तं भूयणइगमणयं जह अड णिव्वइदिणं वीरे ॥ २७ ॥ ३३ पारद्धा जा किरिया पयण-विहाणादि कहइ जो सिद्धा। लोए य पुच्छमाणे तं भण्णइ वट्टमाण-णयं ॥ २८ ॥ ३४ णिमण्णमिव पयंपदि भाविषयत्थं णरो अणिप्पण्णं । अप्पत्थे जह पत्थं भण्णइ सो भावि णइगमो त्ति णओ ॥२९॥ ३५ २ संग्रह अवरे परमविरोहे सव्यं अस्थि त्ति सुद्धसंगहणो । होइ तमेव असुद्धो इगजाइविसेसगहणेण ॥ ३० ॥ ३६ ३ व्यवहार जं संगहेण गहियं मेयइ अत्थं असुद्ध सुद्धं वा ।। सो ववहारो दुविहो असुद्ध-सुद्धत्थ भेयकरो ॥ ३१ ॥ ३७ ४ ऋजसूत्र जो एयसमयवट्टी गिण्हइ दव्वे धुवत्तपज्जाओ। सो रिउसुत्तो सुहमो सव्वं पि सदं जहा खणिय ॥ ३२ ॥ ३८ मणुवाइयपजाओ मणुसुत्ति सगढ़िदीसु वटुंतो । जो भणइ तावकालं सो थूलो होइ रिउसुत्तो ॥ ३३ ॥ ३९ जो वट्टणं च मण्णइ एयट्टे भिण्णलिंगमाईणं । सो सद्दणओ भणिओ णेओ पुस्साइयाण जहा ॥ ३४ ॥ ४० For Private And Personal Use Only
SR No.020812
Book TitleTattva Samucchaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherBharat Jain Mahamandal
Publication Year1952
Total Pages210
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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