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सुलसा
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ब्रह्मानुं रूप धारण करयां उतां पण सुखसाने पोतानी पासे नहिं आवेली जाणी, फरीसर्गक्षको. बीजे दिवसे ते अंबड, कपटथी पीला वस्त्रबालो, पद्म नानिने विषे जेने एवो, गरुडना वाहनवालो, चार हाथवालो, गदा, शंख, चक्र, श्रने धनुष्य के हाथमा
अनागतामिमां मत्वा, वितीयदिवसे पुनः॥ दैक्षिणेन पुरं नत्वा, "विष्णुस्तस्थौ स मायया ॥६५॥ पीतांबरः पद्मनानः, पन्नगारातिवादनः ॥ चतुर्नुजो गेंदाशंखचक्रकोदंमपाणिकः ॥६६॥ लक्ष्मीप्रमुखकांतानिः, परितः परिवारितः॥
कौस्तुनाश्लिष्टहृदयो, मैंदामायासमन्वितः॥ ६ ॥ विशेषकम् जेना एवो, वली चारे तरफ लक्ष्मी विगेरे स्त्रीजना परिवारथी व्याप्त, कौस्तुन मणिथीence ॥ व्याप्त हृदयवालो, अने महा मायाथी युक्त एवो विष्णु थश्ने राजगृह नगरना दक्षि ण दरवाजे बेगे. ॥६५॥ ६६ ॥ ६॥
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