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( १२ )
पोहोता विमलगिरि ठाम रे ॥ कुं० ॥ ८३ ॥ जिनवर नक्ति पूजा करी, कोधो वारमो उद्धार रे || नवन नी पायो कष्टमय. जेएमय प्रतिमा सार रे || कु० ॥८४॥ पांव ina वीर विचें प्रांत, वरस चोरासी सहस्स रे ॥ चिकुंसय सीतेर वर्षे दुबो, वीरथी विक्रम नरेस रे ॥ ८५॥ ॥ ढाल ॥ नवमी पूर्वी देशी ॥
॥ धन्य धन्य शत्रुंजय गिरिवरू, जिहां हवा सिद्ध अनंत रे || वली होसे इसे तीरयें, इम नाखे जगवं तरे ॥ धन्य० ॥ ८६ ॥ विक्रमयी एकसो खावे, व रसें दू जावड शाह रे || तेरमो उद्धार शत्रुजें क यो याप्या यादिजिन नाह रे || धन्य० ॥ ८७ ॥ प्रतिमा जरावी रंग, नवा श्री प्रादिजिणंद रे || श्री शत्रुज शिखरे थापीया, प्रासादें नयणानंद रे ॥धन्य ॥ ॥ ८८ ॥ पांव जावड प्रांत रे, पंचवीश कोडी म याज रे || लाख पंचाणू ऊपरें, पञ्चोत्तर सहस्स नूपा ल रे ॥ धन्य० ॥ ८९ ॥ एटला संघवी हा हवे, चन्दसमो उद्धार विसाल रे ॥ बारतेरोत्तरें सोय क रे, मंत्री बाहडदे श्रीमान रे || धन्य ॥ ५० ॥ (प्रति मानवी रंग, नवी श्री रुपनजिद रे || बीजे शिख रें पावीया, प्रासाद नयणानंद रे ॥ धन्य० ॥ १ ॥ )
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