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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra श्रीस्थानाङ्गसूत्र सानुवाद 11 86 11 www.kobatirth.org अथ द्वितीयस्थानकाध्ययने द्वितीयः उद्देशः अहिं प्रथम उद्देशकमा द्वित्वविशिष्ट जीव तथा अजीवना धर्मो का हवे बीजा उद्देशकमां तो द्वित्वविशिष्ट ज जीवना वा छे. आ संबंधवडे प्राप्त थयेल आ उद्देशकनुं प्रथम सूत्र जे देवा उड्ढोवैवन्नगा कप्पोववन्नगा विमाणोववन्नगा चारोववन्नगा चारद्वितीया गतिरतिया गतिसमावन्नगा, तेसिणं देवाणं सता समितं जे पावे कम्मे कज्जति तत्थगतावि एगतिया वेदणं वेति अन्नत्थतावि एगतिया वेअणं वेदेति (१) णेरइयाणं सता समियं जे पावे कम्मे कज्जति तत्थगतावि एगतिया वेयणं वेदेति अन्नत्थगतावि एगतिआ वेयणं वेदेंति, जाव पंचेंद्रियतिरिक्खजोणियाणं मणुस्साणं सता समितं जे पात्रे कम्मे कज्जति इहगतावि एगतिता वेयणं वेयंति अन्नत्थगतावि एगतिया वेयणं वेयंति, मणुस्तवज्जा सेसा एक्कगमा (२) । सू० ७७ मूलार्थः- जे देवो ऊर्ध्वलोकमां उत्पन्न थयेला छे, ते वे प्रकारे छे -१ कल्पोपनक - सौधर्मादि देवलोकमां उत्पन्न थयेला १. बाबूबाळी प्रतमां तं दुबिहा पं० तं०- आवो पाठ छे, समितिनी प्रतमां नथी, For Private and Personal Use Only Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir स्थानका ध्ययने उद्देशः २ तत्रान्यत्र कर्म वेदनं ७७ सूत्रम् ॥ ९८ ॥
SR No.020691
Book TitleSthanang Sutram Sanuvadasya
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorAbhaydevsuri
PublisherAbhaydevsuri
Publication Year
Total Pages377
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sthanang
File Size19 MB
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