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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir reaaseeratapASSrranteertebraat ॥सर्वार्थसिद्धिवचनिका पंडित जयचंदजीकृता ॥ नवम अध्याय ॥ पान ७०४ ॥ - याका अर्थ- दर्शनमोहके होते तो अदर्शनपरीषह होय है । अर अंतरायकर्मके होतें अलाभपरीषह होय है । इहां यथासंख्य संबंध करना । दर्शनमोहके होते अदर्शन परीषह, लाभा- | न्तरायके होते अलाभपरीषह ऐसें ॥ आगै पूछे है कि, आदिका मोहनीयका भेदतें एक परीषह कह्या, बहुरि दूजा मोहनीयके भेदतें केते परीषह होय हैं ? ऐसे पूछे सूत्र कहै हैं..... ॥ चारित्रमोहे नाग्न्यारतिस्त्रीनिषद्याक्रोशयाचनासत्कारपुरस्काराः ॥ १५॥ ___याका अर्थ- चारित्रमोहके होते नाग्न्य, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचना, सत्कारपुरस्कार ए सात परीषह हो हैं । इहां पूछे है कि, पुरुषवेदके उदयआदिके निमित्ततें नाग्न्या- | दिपरीषह होय हैं । इहां सो इनकै तौ मोहका निमित्तपणा हमने जाण्यां, परंतु निषद्यापरीषह तो आसनका परीषह होय है, याकै मोहका उदयका निमित्त कैसे ? ताका समाधान, जो, आसन| विर्षे प्राणीनिका परिहार प्रयोजन है । सो प्राणीनिकी पीडाके परिणाम मोहके उदयतें होय है। | तातें आसनसे चिगना . मोहके उदयके निमित्ततें होय है । तात याके उदयकी मुख्यता है । || आगे अवशेष परीषहका निमित्त कहनेकू सूत्र कहै हैं ॥ वेदनीये शेषाः ॥ १६ ॥ a For Private and Personal Use Only
SR No.020662
Book TitleSarvarthsiddhi Vachanika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaychand Pandit
PublisherKallappa Bharmappa Nitve
Publication Year1833
Total Pages824
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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