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हृदय में उतना ही रखना, जितना सुनने में, देखने में और जानने में आया हो। ठीक इसी भाँति किसी भी व्यक्ति के समक्ष...उपस्थिति में जो हमने देखा और जाना है वह एकदम....यकायक बिना अगले व्यक्ति की योग्यता जाने-समझे कभी नहीं कहनी चाहिए। विरोधी भले ही कैसी भी ईर्ष्या से बात....चर्चा करता हो। लेकिन हमें भूल कर भी कभी उनका अशुभ हों ऐसा उनके जैसा प्रयत्न नहीं करना चाहिए।
कर्म के अचल-अटल सिद्धांत के अनुसार सर्वजीव को शुभाशुभ परिणाम सहते हैं। इस तरह तथ्य को परिलक्षित कर कि कर्म-सिद्धांत के अनुसार ही दुःखों की प्राप्ति होती है, हमेशा समताभाव धारण कर नये सिरेसे कर्म-बंधन नहीं करना चाहिए।
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