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लिपि-समस्या/207 नीचे दी जाती है : उ अ ओ औ छ ज झ उ,ऊ,, , , ड., 2, 5. 8 . भ ल श स . है ख
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इस अक्षरावली पर दृष्टि डालने से एक बात तो यह विदित होती है कि 'उ ऊ प्रो यौ' चारों स्वरों में 'मूल स्वर' का एक रूप है, उ ऊ में भी और 'भो यौ' में भी वह है ११ इसमें शिरोरेखा देकर 'उ' बनाया गया है इसी में 'ज' की मात्रा लगाकर '' बनाया गया है । यह 'ऊ' की मात्रा -" और यह अशोककालीन ब्राह्मी की 'ऊ' की मात्रा का ही अवशेष है जो आज तक चला आ रहा है। ओ औ में 2 की रेखा को 3 की भाँति वृत्तांवित या घुण्डीयुक्त कर दिया गया है। फिर 3 पर शिरोरेखा में भी अशोक लिपि की परम्परा मिलती है। दोनों ओर '_' यह लगाने में 'यौ' बनता है, ये 'नो' की मात्राएं हैं । 'नौ' की मात्रा में भी एक रेखा (ऊ) की मात्रा के सिर पर चढ़ाई गयी है । ये ब्राह्मी के अवशेष हैं। यही प्रवृत्ति कु-कुमें भी मिलती है। के के, को कौ में बंगला लिपि की मात्राओं से सहायता ली गई है।
अब यहाँ कुछ विस्तार से राजस्थान के ग्रन्थों में मिलने वाली अक्षरावली या वर्णमाला पर विस्तार से वैज्ञानिक विश्लेषगापूर्वक विचार डॉ. हीरालाल माहेश्वरी के शब्दों में दिये जाते हैं : राजस्थानी की और राजस्थान में उपलब्ध प्रतियों के विशेष सन्दर्भ में उनकी वर्णमाला विषयक ज्ञातव्य बातें निम्नलिखित हैं--- 1. (क) राजस्थान में उपलब्ध ग्रन्थों में प्रयोग में आयी देवनागरी की वर्णमाला की कुछ
विशेषताएं कहीं-कहीं मिलती हैं। उन्हें हम इन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं :
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