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श्रीदशशाखीय मूल सूत्रम् ।
॥ ८॥
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CAMERAMA
तत्थवि तदणूणं हदि अभावा णओवलंभोऽवि। चित्तस्सवि विण्णेओ एवं सेसोबओगेसु ॥११७।। खाओबसमिगभावे दढजत्तकयं सुहं | तृतीयपश्चा अणुढाणं । परिवडियंपि हु जायइ पुणोवि तब्भावबुड्डिकरं ॥११८।। अणुहवसिद्ध एवं पार्य तह जोगभावियमईणं । सम्ममवधारियव्वं शकम् । बुहेहिं लोगुत्तममईए ॥ ११९ ।। जिण्णासावि हु एत्थं लिंगं एया। हंदि सुद्वाए। णेव्वाणंगनिमित्तं सिद्धा एसा तयत्थीणं ॥ १२० ॥ धिसद्धासुहविविदिसया जे पायसो उ जोणित्ति । सण्णाणादुदयम्मि पइडिया जोगसत्थेसु ।। १२१ ।। पढमकरणोवरि तहा अणहिणिविहाण संगया एसा । तिविहं च सिद्धमेयं पयड समए जओ भणियं ॥१२२।। करणं अहापवत् अपुरमणियट्टि चेव भब्वाणं । इयरेसिं पढम चिय भण्णइ करणत्ति परिणामो ॥ १२३ ॥ जा गठी ता पढम गठिं समइच्छओ भवे बीयं। अणियट्टीकरण पुण सम्म| त्तपुरक्खडे जीवे ।। १२४ ॥ इत्तो उ विभागाओ अणादिभवदव्वलिंगओ चेव। णि उणं णिरूवियव्वा एसा जह मोक्खहेउत्ति ॥१२५।। माणो भावओ इमीए परोवि हु अबड्डपोग्गला अहिगो । संसारो जीवाणं हंदि पसिद्धं जिगमयम्मि ।। १२६ ॥ इय तंतजुत्तिओ खल |णिरूवियव्या बुहेहिं एसत्ति । ण हु सत्तामत्तेग इमाएं इह होइ णेधाणं ॥१२७।। किंचेह छेयकूडगस्वगगायं भत्ति समयविऊ । तंतेस चित्तभेयं तंपि हु परिभावगीयं तु ॥१२८।। दवणं टंकण य जुतो छेयं हु रूवगो होइ। टंकविहणो दब्वेविण खलु एगंतछेओनि ॥१२९।। अइब्वे टकेगवि कूडो तेग विगा उ मुद्दत्ति। फलमे तो ए। चिा मुद्धाग पवारगं मोतु ॥१३०॥ तं घुग अगत्थफलदं हाहिगयं जमणुवओगिति । आयगय चिय एत्थं चिंतिज्जइ समयपरिसुद्धं ॥ १३१ ।। भावेणं वण्णादिहिं चव सुद्धेहि बंदणा | छेया । मोकखफलच्चिय एसा जहोइयगुणा य णियमेणं ॥ १३२ ॥ भावणं वण्णादिहिं तहा उजा होइ अपरिसुद्धत्ति । बीयगरूबसमा ४ खलु एसावि सुहति णिदिडा ॥ १३३ ॥ भावविहूणा वण्णाइएहिं सुद्धावि कूडरूवसमा । उभयविहूणा णेया मुद्दप्पाया अनिडफला | ॥८॥
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