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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra अत्तसञ्ञा अत्तसज्ञा स्त्री० [आत्मसंज्ञा], अज्ञान के कारण धर्मों में अनित्यता की अनुपश्यना न होने के कारण धर्मों को आत्मा के रूप में जानना या देखना, वास्तविक सत्ता के विषय में मिथ्या धारणा अनिच्चस- दुक्खसअसमनुपस्सनलक्खणा अत्तसज्ञा नेति. 25. अत्तसन्निय्यातन नपुं [आत्मसन्निर्यातन] अपने को पूरी तरह से लगा देना या समर्पित कर देना, आत्मपरित्याग - तत्थ अत्तसन्निय्यातनं नाम अज्जादि कत्वा अहं अत्तानं बुद्धस्स निय्यादेमि, धम्मस्स सङ्घस्साति एवं बुद्धादीनं अत्तपरिव्यजनं दी. नि. अ. 1.187 म. नि. अट्ट (मू.प.) 1 (1). 141, तुल. अत्तनिय्यातन. अत्तसन्निस्सित त्रि.. [आत्मसम्मिश्रित] अपने से सम्बन्धित अपने पर आश्रित अत्तसन्निस्सिता अतिथ तथैव परनिस्सिता, उत्स. वि. 483 विलो. परनिस्सित. अत्तसम त्रि. [आत्मसम], अपने समान, अपने जैसा, अत्यन्त घनिष्ठ साथी, जो अपने जैसा प्रिय होनत्थि अत्तसमं पेमं स.नि. 1 (1). 8; ततुत्तरं अत्तसमोंपि होति, जा० अट्ठ. 1.349; अत्तना समे निन्नानाकरणेपि पुग्गलेति, जा. अनु. 3.89. अत्तसमानता स्त्री. [आत्मसमानता] अपने से समानता, अपना ही जैसा मानना अत्तसमानताय तेसु विरोधं विनेन्तो f. 31.2.192. अत्तसमुद्वान त्रि.. [आत्मसमुत्थान] अपने से उत्पन्न, अपने भीतर से ऊपर उठकर आने वाला सल्लं अत्तसमुद्वानं भवनेत्तिप्पभावित थेरगा. 767. अत्तसम्पत्ति स्त्री० [आत्मसम्पत्ति], अपनी सम्पत्ति, निजी धन-दौलत अत्तसम्पत्तिनिगूहन लक्खणता अत्तसम्पत्तिग्गहणलक्खणता वा वेदितब्बा, ध. स. अट्ठ " - www.kobatirth.org = 132 401. अत्तसम्पदा त्रि.. [आत्मसम्पदा ] अपने आप में परिपूर्णता चित्त की सम्पूर्णता अरियरस अद्वह्निकस्स मग्गस्स उप्पादाय एवं पुब्बङ्गम यदिदं - अत्तसम्पदा स. नि. 3 (1).28. अत्तसम्भव त्रि. [आत्मसम्भव], अपने से उत्पन्न, अपना स्वयं का अस्तित्व, आत्मभाव - अत्तनाहि कतं पापं, अत्तजं अत्तसम्भवं ध. प. 161 तं विदित्वा महमत्तसम्भव, थेरगा. 260, अत्तसम्भवं अत्तनि सम्भूतं अत्तायत्तं ... थेरगा. अड. 1.409; अभिन्दि कवचमिवत्त- सम्भवन्ति, उदा. 143. अत्तसम्भूतत्र [आत्मसम्भूत] अपने आप से उत्पन्न, अपने से उत्पन्न, अपने व्यक्तित्व के अन्दर में उदितस्नेहजा अत्तसम्भूता निग्रोधस्सेव खन्धजा, सु. नि. 274. ww अत्तहेतु अत्तसम्मापणिधान नपुं. अपना किया हुआ सम्यक् संकल्प, अपने द्वारा किया गया पक्का शुभ इरादा अत्तसम्मापणिधानं सीलानं पदद्वान् नेति 26: अत्तसम्मापणिधानं हिरिया च विपस्सनाय च साधारणं पदद्वानं, नेति. 42. अत्तसम्मापणिधि स्त्री, उपरिवत पतिरूपदेसवासो च.. अत्तसम्मापणिधि च एतं मङ्गलमुत्तमं सु. नि. 283: इक कच्चो अत्तानं दुस्सील सीले पतिद्वापेति, अस्सद्ध सद्धासम्पदाय, पतिद्वापेति, अयं वुच्चति अतसम्मापणिधी ति सु. नि. अड. 2.15. " अत्तसरण त्रि. ब. स. [आत्मशरण] अपने लिये स्वयं अपने को शरणस्थल बनाने वाला, दूसरे का आश्रय न लेने वाला - अत्तदीपा, भिक्खवे, विहरथ अत्तसरणा अनज्ञसरणा, दी. नि. Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir For Private and Personal Use Only 3.42. अत्तसारसार पु०, आत्मसार नामक तथाकथित सार-तत्त्व निरयलोको असारो निस्सारो सारापगतो ... अत्तसारसारेन वा निच्चेन वा महानि. 303. अत्तसिनेह पु.. [आत्मस्नेह]. स्वार्थपरता, अपने से स्नेह, स्वार्थी मनोवृत्ति - यस्मा सन्तासो अत्तसिनेहेन होति, अत्तसिनेहो च तण्हालेपो सु. नि. अड. 1.100. अत्तसुख नपुं तत्पु. स. [आत्मसुख] अपना सुख, अपने द्वारा अनुभूत सुख अत्तसुखरस हेतु जा. अ. 1.348; न पण्डिता अतसुखस्स हेतु पापानि कम्मानि समाचरन्ति जा. " अट्ठ. 6.204. " अत्त-सुज्ञता स्त्री अत्त-सुज्ञ का भाव [आत्मशून्यता ]. तीन शून्यताओं में से एक, किसी भी वस्तु में आत्मा जैसे धर्म का न पाया जाना, आत्मा के स्वभाव की केसे शून्यता ताव अत्तसुञता अत्तनिय सुञ्ञता, निव्यभावसुज्ञताति तिस्सो सुञ्ञता होन्ति विभ. अड्ड. 247, अत्तसुद्धि स्त्री तत्पु स [आत्मशुद्धि] अपनी शुद्धि, आत्मशुद्धि - अत्तसुद्धिअभिलासेन सीलब्बतपरामासदिट्ठि गण्हापेन्ति, उदा. अड. 287. अत्तहित नपुं. [आत्महित] अपना हित अपना कल्याणअत्तहिताय पटिपन्नो होति नो परहिताय दी. नि. 3.185; अत्तहितपरहितसब्बलोकउभयहितमेव चिन्तयमानो चिन्तेति, अ. नि. 1 (2).207. अत्तहेतु अ. [आत्महेतु] स्वयं अपने लिये अपनी भलाई के लिये - न अत्तहेतु न परस्स हेतु, ध. प. 84; अत्तहेतु परहेतु, धन हेतु च यो नरो. सु. नि. 122; इति अतहेतु वा परहेतु वा भासिता होति., अ. नि. 1 (1).151. *** -
SR No.020528
Book TitlePali Hindi Shabdakosh Part 01 Khand 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavindra Panth and Others
PublisherNav Nalanda Mahavihar
Publication Year2007
Total Pages761
LanguageHindi
ClassificationDictionary
File Size29 MB
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