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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kabatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्री कल्पसूत्र सातवां हिन्दी व्याख्यान अनुवाद ||12611 # चितायें कराई । एक तीर्थकर के शरीर के लिए, एक गणधरों के शरीर के लिए, और एक शेष मुनियों के लिए है ह। फिर आभियोगिक देवों से क्षीरसमुद्र से जल मंगवाया । उस क्षीरसमुद्र के जल से इन्द्रने प्रभु के शरीर को स्नान कराया । ताजे गोशीर्षचंदन के द्रव से विलेपन किया, हंस लक्षणवाला वस्त्र ओढाया और सर्व अलंकारों से विभूषित किया । इसी तरह अन्य देवों ने गणधरों तथा मुनियों के शरीर को भी किया । फिर इन्द्र ने विचित्र प्रकार के चित्रों से चित्रित तीन शिविकाएं बनवाई । आनन्द रहित दीन मनवाले तथा अश्रुपूर्ण नेत्र वाले इंद्रने प्रभु के शरीर को शिबिका में पधराया । दूसरे देवों ने गणधरों और मुनियों के शरीरों को शिबिका में पधराया । इंद्रने तीर्थकर के शरीर को शिबिका में से नीचे उतार कर चिता में स्थापन किया । दूसरे देवो ने गणधरों और मुनियों के शरीरों को चिता में र स्थापन किया । फिर इंद्र की आज्ञा से आनन्द और उत्साह रहित हो अग्निकुमार देवों ने चिता में अग्नि प्रदीप्त किया। । वायुकुमार ने वायु चलाया और शेष देवों ने उन चिताओं में कालागुरू, चंदनादि उत्तम काष्ठ डाला तथा सहद और घी के घड़ों से चिताओं को सिंचन किया । जब उनके शरीर की सिर्फ हड्डियां शेष रह गई तब इंद्र की आज्ञा से मेघकुमार ने उन चिताओं को ठंडी कर दी । सौधर्मेन्द्रने प्रभु की दाहिनी तरफ की उपर की दाढ ग्रहण की । ' ईशानेंद्रने उपर की बाई तरफ दाढ ग्रहण की । चमरेंद्र नीचे की दाहिनी दाढ और बलीद्रने नीचे की बाई दाढ ग्रहण की । अन्य देवों ने भी किसी ने भक्तिभाव से, किसीने अपना आचार समझ कर और किनते एकने धर्म समझ ॐकर शेष रही हुई अंगोपांग अस्थियां ग्रहण की। 9960 126 For Private and Personal Use Only
SR No.020429
Book TitleKalpasutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipak Jyoti Jain Sangh
PublisherDipak Jyoti Jain Sangh
Publication Year2002
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Paryushan, & agam_kalpsutra
File Size18 MB
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