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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ४५५ परिचारना-परितापी परिचारना*-स० क्रि० सेवा करना । व्यंग्यपूर्ण शब्दोंमें नायककी निर्दयता, शठता आदिका परिचारिका-स्त्री० [सं०] सेविका, टहल करनेवाली। वर्णन करना। परिचारित करना-स० क्रि० (टु सरक्यूलेट) कोई पत्र, परिज्ञप्ति-स्त्री० [सं०] अच्छी तरह जानना; पहचानना; विधेयक आदि विशिष्ट लोगोंकी राय जाननेके लिए चारों बातचीत, कथोपकथन । तरफ वितरित करना या घुमाना, परिपत्रित करना। परिज्ञात-वि० [सं०] भली भाँति जाना हुआ; पहचाना परिचालक-पु० [सं०] चारों ओर घुमानेवाला; चलाने- हुआ। वाला; हिलानेवाला; (कंडक्टर) परिचालन, नियंत्रण आदि- परिज्ञान-पु० [सं०] पूरी जानकारी, पूरा ज्ञान; सूक्ष्म का काम करनेवाला; ट्राम (रथ्यायान), बस, ट्रेन आदिमें | शान; पहचान।। यात्रियोंकी देखरेखका भार संभालनेवाला कर्मचारी । वि० परिणत-वि० [सं०] चारों ओरसे झुका हुआ बहुत झुका (कंडक्टर) ताप या विद्युत्को कणोंकी सहायतासे एक स्थान- हुआ, अत्यंत नत; परिणाम या रूपांतरको प्राप्तः पका से दूसरे स्थानतक पहुँचानेवाला; वह वस्तु जो विद्युत्को हुआ, पक्का; जिसकी पूरी वृद्धि हो चुकी हो; प्रीढ़ः पुष्ट, अपनेमेंसे होकर चला जाने दे। (बुरा परिचालक-दे० परिपक्का पचा हुआ; ढलता हुआ ( वय ); समाप्त । 'कुचालका' अच्छा परिचालक-दे० 'सुचालक')। परिणति-स्त्री० [सं०] चारों ओरसे झुका होना; पूरा परिचालन-पु० [सं०] चारों ओरसे चलाना; हिलाना- झुकाव; रूपांतरको प्राप्त होना; पकना; पूर्ण वृद्धि प्रौढ़ डुलाना; चारों ओर घुमाना; (कंडक्शन) गमी या बिजली- होना; परिणाम परिपाक, पचना; अंत, अवसान । के फैलनेकी वह रीति जिसमें गर्मी या बिजली एक कणसे परिणय-पु० [सं०] चारों ओर (विशेषकर विवाहमंडपमें दूसरे कणको मिलती है और कण स्वयं नहीं चलते। स्थापित अग्निके चारों ओर ) ले जाना; विवाह । परिचालित-वि० [सं०] जिसका परिचालन किया गया हो। परिणयन-पु० [सं०] ब्याहना, विवाह करना । परिचित-वि० [सं०] जिससे जान-पहिचान हो, जिसका परिणाम-पु० [सं०] एक अवस्थासे दूसरी अवस्थाको प्राप्त परिचय प्राप्त हो; एकत्र किया हुआ ढेर लगाया हुआ। होना, रूपांतर होना, बदलकर दूसरे रूप, आकार, गुण परिचिति-स्त्री० [सं०] परिचय, जान-पहचान । आदिको प्राप्त होना; प्रकृतिका अन्यथा भाव (सांख्य०); परिचेय-वि० [सं०] जान-पहचानके योग्य; एकत्र करने । चित्त, इंद्रिय आदिका एक धर्म या संस्कारको प्राप्त योग्य; जानने योग्य; खोज करने योग्य । होना (योग); पचना, परिपाका पूर्ण वृद्धि, पूरा विकास परिचो*-पु० परिचय, जानकारी। पकाव, पक्का होना; आयुका ढलना, वृद्ध होना; समय या परिच्छद-पु० [सं०] ढाँकनेकी वस्तु; ढाँकनेका कपड़ा। अवधिका समाप्त होना; फल, नतीजा; एक अर्थालंकार आदि; आच्छादन, वस्त्र, पहनावा; राजाके साथ चलने- जहाँ उपमान उपमेयके साथ मिलकर कोई क्रिया करे । वाले अनु नर, सैनिक आदि; राजाके बाह्य उपकरण (छत्र, -दर्शी(शिन)-वि०किसी कार्य के भले या बुरे फलको चमर आदि ); यात्राके लिए आवश्यक सामान; माल, जाननेवाला, दूरदशी । -वाद-पु. यह सिद्धांत कि असबाब । कार्य कारणमें अव्यक्त रूपसे विद्यमान रहता है और इस परिच्छन्न-वि० [सं०] ढका हुआ, आवृत; परिच्छद अर्थात् | प्रकार अव्यक्त कार्य ही कारण है तथा व्यक्त कारण ही अनुचर आदिले युक्त छिपाया हुआ। कार्य । -वादी(दिन)-पु० परिणामवादको माननेपरिच्छा*-स्त्री० दे० 'परीक्षा' । वाला । -शूल-पु० भोजनके पचते समय पेटमें उठनेपरिच्छिन्न-वि० [सं०] जिसकी सीमा या व्याप्ति निर्धा वाला शूल । रित की गयी हो जिसका चारों ओरका कुछ अंश छाँट परिणामी (मिन)-वि० [सं०] जो परिणामको प्राप्त होता दिया गया हो; अलग किया हुआ, विभक्त परिमित रहे, परिणामको प्राप्त होता रहना जिसका स्वभाव हो; उपचारित । (रिजल्टेंट) जो दो या दोसे अधिक कारणोंका संयुक्त परिपरिच्छेद-पु० [सं०] काट-छाँटकर अलग करना; अवधि, णाम हो, जो किसीके परिणामस्वरूप उत्पन्न हो या सीमा; अवधारण; निर्णय, निश्चय (जैसे सत्य और असत्य- सामने आये। का); विभाजन; परिभाषा; सटीक परिभाषा; उन कई परिणीता-स्त्री० [सं०] विवाहिता स्त्री। विभागोंमेंसे कोई एक जिनमें कोई ग्रंथ विषयके अनुसार परिणेतव्या,परिणेया-वि० स्त्री० [सं०] ब्याहने योग्य । विभक्त रहता है; किसी ग्रंथ या पुस्तकका वह भाग जिसमें परिणेता(त)-पु० [सं०] पति, स्वामी। किसी एक विषयकी चर्चा हो । परितः(तस)-अ० [सं०] चारों ओर चारों ओरसे । परिजंक-पु० दे० 'पर्यंक' । परितच्छ*-वि० दे० 'प्रत्यक्ष' । अ० देखते-देखतेआँखोंके परिजटन*-पु० दे० 'पर्यटन'। समाने । परिजन-पु० [सं०] भरण-पोषणके लिए आश्रित लोग, स्त्री, | परितप्त-वि० [सं०] बहुत तपा हुआ, बहुत गरम; संतप्त । पुत्र, दास आदि; वे लोग जिनका कोई प्रतिपालन करे, परिताप-पु० [सं०] अत्यधिक ताप, बहुत गरमी; अत्यधिक राजा आदिके साथ-साथ चलनेवाले लोग, अनुचरगण । । ल लाग, अनुचरगण । दुःख, संताप; अति शोक, भय, कंप । परिजल्पित--पु० [सं०] सेवकका अपने स्वामीकी निर्दयता, परितापी(पिन)-वि [सं०] अति उष्ण, जलता हुआसा: शठता आदिके वर्णनके द्वारा अव्यक्त रूपसे अपना कौशल, जिसे परिताप हो; संतापयुक्त; बहुत अधिक क्लेश पहुचानेउत्कर्ष आदि जताना; उपेक्षित या अवमानित नायिकाका | वाला । पु० सतानेवाला, अति दुःख देनेवाला । २९-क 117 For Private and Personal Use Only
SR No.020367
Book TitleGyan Shabdakosh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanmandal Limited
PublisherGyanmandal Limited
Publication Year1957
Total Pages1016
LanguageHindi
ClassificationDictionary
File Size28 MB
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