________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir अ० // 3 // दारंनमानंतद्वत्स्याद्वैताभावःपरात्मनि // 37 // असंगस्यचसम्बन्धोद्वैतेनाथेतरेणवा॥ सा० कथंभवेदतोवक्तिश्रुतिरव्यवहार्यताम्॥३८॥ अतस्त्वमेवचोद्योऽसिव्यवहारः कथंतव॥ उपपनोनचेदस्मदिष्टंसिद्धंसुखीभव॥३९॥द्वैताभावेश्रुतिमानमुररीकुर्वतस्तव ॥मानमेयव्यवहृतौनप्रश्नोऽस्त्युपपत्तिमान् // 40 // इतिचेद्दयवहारोऽसौत्वयैवांगीकृतस्ततः // वन्मतेनोत्तरंदत्तंवद्वोधायनमेक्षतिः॥४१॥ ननुमत्संमतेवेदेद्वैतमप्युक्तमस्तिहि // तदेवमेमतंयस्मात्प्रत्यक्षमनुभूयते // 42 // इतिचेहिजगतोब्रह्मणोभेदउच्यते॥ उतजीवादथान्योन्यंक्वकस्माद्भेदसंभ्रमः // 43 // ऐतदात्म्यमिदंसर्वसर्वब्रह्मेतिवा क्यतः॥प्रपंचब्रह्मणोःदोनिरस्तोऽस्तिनवावद॥४४॥ नभेदःसृष्टिवाक्यार्थोभिन्नसृष्टेरसंभवात् // यस्माद्भिन्नंयच्चलोकेतस्यकार्यनतद्भवेत् // 45 // स्तम्भकुम्भादिवत्तस्मात्प्रकृतीपंचमीस्मर॥अतएवधुवाद्यौरियादिश्रुतिसमन्वयः॥४६॥ द्यवादीनांच-|| कार्यत्वात्कार्याणांनाशदर्शनात् // स्वतोध्रुवत्वायोगेनब्रह्मणाऽदइष्यताम् // 47 // For Private and Personal Use Only