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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir (१३) ॥श्री सिद्धाचळ (रायण)नुं स्तवन त्रीजं ॥ ॥ भवी तुमे वंदोरे सुरीश्वर गच्छराया-ए देशी ॥ ॥ श्री सिद्धाचळ अंतरजामी, जीवन जगदाधार, शांत सुधा रस ज्ञाने भरीयो, सिद्धाचळ शणगार; रायण रुडी रे जिहां प्रभु पाय घरे, विमलगिरि वंदो रे देखत चित्त ठरे, पुण्यवंता प्राणी रे प्रभुजीनी सेवा करे. ॥१॥ एसो तीरथ ओर न जगमां, भोखे श्री जिनराय, दुर्गति कापे ने पार उतारे, वहालो आपे केवलज्ञान, मविजन भावे रे जे एनुं ध्यान धरे, राय० विमल० पुण्य० ॥२॥ वावडीओ रसकुंपा केरी, मणि रे माणेकनी खाण, रयण खाण बहु राजे हो तीरथ, एवी श्रीजीनवाण; सुखना सनेही रे बंधन दूर करे, रायः विमल० पुण्य० ॥३॥ पांच करोडशुं पुंडरीक गणधर, त्रण करोडभुं राम, वीश करोडशुं पांडव सिध्या, सिद्धक्षेत्र सिद्ध ठाम; मुनिवर मोटा रे अनंतानंत तरे, राय० विमळ० पुण्य०॥४॥ गुण अनंता गिरिवर केरा, सिध्या साधु अनंत, वळी रे सिद्धशे वार अनंती, एम भाखे भगवंत; भवोभव केरां रे पातक दूर टळे, राय० विमळ० पुण्य० ॥ ५॥ द्रव्य भावशुं पूजा करतां, पूजो श्री जिन पाय, चिदानंद आतमसुख बेदी, ज्योतिसें ज्योत मिलाय, कीर्ति एनी रे माणेक मुनि करे, राय० विमळ० पुण्य० ॥६॥ For Private And Personal Use Only
SR No.020138
Book TitleChaityavandan Stuti Stavanadi Sangraha Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivnath Lumbaji
PublisherPorwal and Company
Publication Year1925
Total Pages242
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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