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४३६ धर्म बिहु भेदे जिनवर नाखीयो, साधु श्रावक तणो भविक चित्त वासीयो || ए समकित तणो सार छे मूलगु, अहर्निश आगम ज्ञान ने बोलगु ॥३॥ मनुज सुर शासन सांनिध्य कारकु, श्री अशोकनिधि विघ्न भय वारकु । शीतल स्वामीना ध्यानथी सुख लहे, धीर गुरु सीस ज्ञान विमल कवि श्म कहे ॥४॥
॥अथ त्रीजनी स्तुति ॥ ॥ संखेसर पासजी पुजीये ॥ ए देशी ॥ ॥श्रेयांस जिणेसर शिव गया, ते त्रीज दीने निरमल थया॥ ऐशी धनु सोवन वन काय, भव भव ते साहिब जिनराय ॥१॥ विमल कुंथु धर्म सुविधि जिना,जस जन्म ज्ञान मनुज्ञान धना ॥वर्तमान कल्याणक खट थया, जिनजी दीन दिन करजो मया ॥२॥ त्रिण तत्व जिहां किण उपदिश्यां, ते प्रवचन वयणां चित्त वश्यां ।। त्रिण गुप्तिगुप्ता मुनिवरा, ते प्रवचन वांचे श्रुत धरा ॥३॥ इम सुर मानवी कर करा, जे समकित दृष्टि सुरवरा ॥ त्रिकरण शुध समकित तणी, नय लीला होजो अति घणी ॥ ४ ॥
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