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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir उत्तरस्थान भाषाटीकासमेत। अर्थ-सद्योव्रण में सातदिन तक इस | कमल के पत्तों से लिपटी हुई उंगली द्वारा प्रकार चिकित्सा करने से प्रशमन होजाता। पीडन करे । है। यदि सात दिनमें घाव अच्छा नहोतो नेत्ररोग पर घत । पूर्वोक चिकित्सा करना चाहिये । ततोऽस्य सेचने नस्ये तर्पणे च हित हविः। घृष्ट ब्रणमें चूर्ण। विपकमा यष्टयाव्हजीवकर्षभकोत्पलैः । प्रायः सामान्यकर्मेदं वक्ष्यते तु पृथक्पृथक | सपयस्कः परं तद्धि सर्वनेत्राभिघातजित्। घृष्टे रुजं निगृह्याश व्रणे चूर्णानि योजयेत् ॥ अर्थ--इस तरह नेत्र को अपने स्थान अर्थ-सब प्रकार के ताजी घावों की । पर स्थापित करके , मुलहटी ,जीवक,ऋषचिकित्सा कही गई है, अब इन घष्टादि । भक और उत्पल इनका कल्क करके दूधके घावों की चिकित्सा का विशेषरूपसे अलग साथ बकरी का घी पकाकर इस घीकोसेचन अलग वर्णन करते हैं । घृष्ट ब्रणमें वेदना नस्य और तपर्ण द्वारा उपयोग में लावै । को शान्त करके चूर्ण का प्रयोग करना यह घी नेत्रों की सब प्रकार की चोटमें चाहिये। | हितकारी होताहै । अवकृत्त की चिकित्सा। नेत्रका अन्यरोग। फलकादीन्यवकृत्ते तु गलपीडावसन्नेऽक्षिण वमनोरलेशनक्षवाः। अर्थ-अवकृत्त नामक घाव में कल्कादि | प्राणायामोऽथवाकार्यःक्रियाचक्षतनेत्रवत् । का प्रयोग करना चाहिये । ___ अर्थ--गलेके दर्द के कारण जो नेत्र अवसन्न अविलंबित का उपाय । विच्छिन्नप्रविलंबिनो। होगये होतो वमन, उक्लेश, छींक वा प्राणासीवनं विधिनोक्तेन वंधनं चानुपीडनम् ॥ याम करना चाहिये । इसमें नेत्रके घायके अर्थ-विच्छिन्न और प्रविलंबी घावोंमें | सदृश चिाकत्सा करना हितकारी होता है । पूर्व कथित विधि के अनुसार सीवन बंधन । कान में सीमन । और अनुपीडन करना चाहिये । कर्णेस्थानाच्च्युते स्यूतेस्रोतस्तैलेन पूरयेत्। स्फुटितनेत्र में कर्तव्य ।। ___ अर्थ--कान जब अपने स्थान से भ्रष्ट असाध्यं स्फुटितं नेत्रमदीर्ण लंबते तु यत। होजाय तब वहां टांके लगाकर कानके छेदमें सन्निवेश्ययथास्थानमध्याविद्धसिरंभिषक। तेल भरदे । पीडयेत् पाणिना पद्मपलाशांतरितेन तत् । छिन्नककटिका में सीमन । अर्थ--नेत्र फूटजाने पर असाध्य होताहै काटिकायांछिन्नायांनिर्गच्छत्यपि मारुते॥ जो नेत्र फूटता नहीं है और दीर्ण होकर समनिवश्यबन्धीयात्म्यूत्वाशीघ्रंनिरंतरम् लटक पडता है उसकी सव शिराओं को अर्थ-ग्रीवाके छिन्न होजाने पर. यदि ऐमी रीति से इकट्ठी करे फि बिद्ध न होने वायु उसमें होकर निकलने लगे तो उसको पाये और नेत्र को अपने स्थान पर लगाकर शीघ्रतापूर्वक यथास्थान में स्थापित करके For Private And Personal Use Only
SR No.020075
Book TitleAshtangat Rudaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVagbhatta
PublisherKishanlal Dwarkaprasad
Publication Year1867
Total Pages1091
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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