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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir चिकित्सितस्थान भाषाटीकासमेत । अर्थ--रुधिर के अति प्रवृत्त होने पर | का मूत्र पान करावे । अथवा गौका दूध रक्तपित्तनाशिनी संपूर्ण क्रिया करनी चाहिये वा हथनी का दूध पीकर निर्बाह करें । तथा रोगी के वातपीडित होने पर वातना- दाह, आनाह, अतितृषा वा मारोग से शिनी क्रिया करे, इसीतरह आनाहादि होने । पीडित रोगी को विशेष करके ऊपर लिखी पर उदावर्त और कफनाशक क्रिया करनी। रीति से रहना चाहिये । चाहिये । विरेचन विधि। इतिश्री अष्टांगहृदयसहितायां भाषा- रूक्षाणां बहुवातानां दोषसंशुद्धिकांक्षिणाम् टीकान्वितायां चिकित्सितस्थाने नेहनीयानि सीषि जठरघ्नानि योजयेत् ॥ गुल्मचिकित्सितं नाम चतुर्दशी __ अर्थ-रूक्ष देहवाले तथा वातदोष से ___ऽध्यायः ॥ १४ ॥ अधिक पीडित उदररोगी को दोषोंकी शुद्धि के निमित्त स्नेहनीय और उदररोग नाशक पंचदशोऽध्यायः। घृतपान कराना चाहिये । अन्य घृत। षइपल दशमूलांबु मस्तुयाढकसाधितम्! अथाऽत उदरचिकित्सितं ब्याख्यास्यामः। । अर्थ -घी चार सेर, पंचकोल और ज. अर्थ--अब हम यहां से उदरचिकित्सित वाखार प्रत्येक एक. पल, इनको पीसकर नामक अध्यायकी व्याख्या करेंगे। दशमूल के सोलह सेर काढे में मिलादे, उदररोग में विरेचन । दही का तोडभी काढे के समान मिलाकर दोषातिमात्रोपचयात्स्रोतामार्गनिरोधनात । पाकबिधि से पाक करे । यह छः पल संभवत्युदरं तस्मान्नित्यमनं विरेचयेत् ॥ __ अर्थ--वातादि दोषों के अत्यन्त बढ कलकों से सिद्ध किया हुआ षट्पलोपलक्षणजाने के कारण स्रोतों का मुख रुकजानेही । लक्षित घृत उदररोग में प्रयोग करना से उदररोग पैदा होते हैं, इसलिये उदररोग. चाहिये। में सदा विरेचन कराना चाहिये । अन्य प्रयोग। उदररोग में स्निग्ध विरेचन । नागर त्रिपलं प्रस्थं घृतलात्तथाऽढकम् ॥ पाययेत्तलमैरडं समूत्रं सपयोऽपि वा। मस्तुनः साधयित्वैतत्पिवेत्सर्वोदरापहम् ॥ मासं द्वौ वाऽथवा गव्यं भूत्रं माहियमेव वा कफपारुतसंभूते गुल्मे च परमं हितम् । पिवेद् गोक्षीरभुज स्याद्वाकरभीक्षीरवर्तनः। अर्थ-सोंठ तीन पल, घी तेल मिला दाहानाहातितृणमूर्छापरीतस्तु विशेषतः । | हुआ एक प्रस्थ दही का तोड एक आढक, ___ अर्थ-गौके दूध वा गोमुत्र के साथ एक इन सबको यथोक्त रीति से पकावै । यह महिने वा दो महिने तक आंडी का तेल घी सब प्रकारके उदररोग तथा वातकफज पान करावे, अथवा दोषानुसार गौ वा भेस गुल्म में परमोपयोगी है। For Private And Personal Use Only
SR No.020075
Book TitleAshtangat Rudaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVagbhatta
PublisherKishanlal Dwarkaprasad
Publication Year1867
Total Pages1091
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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