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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir अष्टांगहृदय । - - स्थित होने पर तृप्तिपर्ण्यन्त अर्थात् पेट भर तेल प्रयोग । कर दूध पानकरावै, अथवा यमक स्नेहपान | सिद्धं दधिसुरामडे दशमूलस्य चांभासि ॥ करके धारोष्ण दुग्ध पान करे अथवा अरंड सिंधूत्थ पंचकोलाभ्यां तैलं सद्योऽर्तिनाशनम् की जडके साथ सिद्ध किया हुआ अथवा ____ अर्थ-दही और सुरामंडमें अथवा दशकच्ची वेलगिरी के साथ मौटाया हुआ दूध मूलके क्वाथमें सेंधानमक और पंचकोल का पान करें। चूर्ण मिलाकर तेल पकाकर सेवन करने से घेदनायुक्त आमकी दवा। | प्रवाहिका और अतिसार से उत्पन्न हुई बे. पयस्युत्वाथ्य मुस्तानां विंशति दना नष्ट हो जाती है । त्रिगुणेऽभसि ॥ ३९ ॥ क्षीरावशिष्टं सत्पीतं हन्यादामं सवेदनम्। ____ अन्य तेल । अर्थ-दूध चार पल, जल वारह पल, षडभिःशुट्याः पलैाभ्यां द्वाभ्यां ग्रंथ्यग्निसैंधवात् ॥ इनको मिलाकर इसमें एक पल नागरमोथा | तैलप्रस्थं पचेना नि:स्सारकरुजापहम् । डालकर पकावे, जब दूध बचरहै, और पा- अर्थ-सोंठ छः पल, पीपलामूल, चीता मी जलजाय तव उतार कर छानले, इस और सेंधानमक प्रत्येक दो दो पल, तेल एक दूधके सेवन से वेदनायुक्त आम नष्ट | प्रस्थ इनको ४ प्रस्थ दहीके साथ पकाकर होजाता है। सेवन करनेसे प्रवाहिका और अतिसार से प्रवाहिका पर पिप्पल्यादि चूर्ण ।। उत्पन्न हुई वेदना शांत होजाती है । पिप्पल्या पिबतः सूक्ष्मं रजो मरिचजन्म वा चिरकालानुषक्ताऽपि नश्यत्याशु प्रवाहिका अन्य तैल। अर्थ-पीपल अथबा कालीमिरचको खुव | एकतो मांसदुग्धाज्यं पुरीषग्रहशूलजित् ॥ वारीक पीसकर जलके साथ पीने से बहत | पानानुवासनाभ्यंगप्रयुक्तं तैलमेकतः।। कालकी उत्पन्न हुई प्रवाहिका भी नष्ट | तद्धि वातजितामग्यं शुलं च विगुणोऽनिलः ___अर्थ-मलकी विवद्धता और शूलको दूर होजाती है। निराम रूपमें घृतपान । करने में एक ओर मांस, दूध और घी है निरामरूपं शूलात लंघनाद्यैश्च कर्षितम् ॥ | है और दूसरी ओर पान, अभ्यंग और अनुवारुक्षकोष्ठमपेक्ष्याग्निं सक्षारं पाययेद् घृतम् ।। सन द्वारा प्रयुक्त किया हुआ अकेला तेल ___अर्थ-जो प्रवाहिका से पीडित रोगीकी । ही मलकी विवद्धता और शलको दूर करदे देह कृश होगई हो, कोष्ठ रूक्ष होगयाहो | ता है, इसका कारण यही है कि बातनाशऔर वेदना रहती हो तथा आमसे रहितहो । क संपूर्ण द्रव्योंमें तेल ही प्रधान है । कपितो उसकी जठराग्नि के बल और शारीरक | त वायु ही शूल है । इसलिये तेल द्वारा वायु वल पर ध्यानदेकर घीमें जवाखार मिलाकर की विगुणता दूर होने पर वायुसे उत्पन्न वेपिलाना उचित है। | दना और मलकी विवद्धता दूर होजाते हैं। For Private And Personal Use Only
SR No.020075
Book TitleAshtangat Rudaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVagbhatta
PublisherKishanlal Dwarkaprasad
Publication Year1867
Total Pages1091
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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