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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www. kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ( ९४६) मष्टांगहृदय । म. ३७ - अर्थ-वातिक दंश छने में खरदरा और अर्थ--तीवणादि भेद से मकडी तीन श्याववर्ण होता है इसमें पर्वभेद और घर | प्रकार की होती है, जैसे तीक्ष्ण विष मध्यभी होता है। | विष और मृदु विष । इसकी चिकित्सा में - दोषानुसार विभाग लक्षण। उपेक्षा करने से काटा हुआ मनुष्य क्रम से तद्विभाग यथास्वं च दोषलिंगैर्विभावयेत् | सात. दस वा पन्द्रहदिन में मरजाताहै । अर्थ--वातादि दोषों के लक्षणों के अनु- मकड़ी के श्वास से विश । सार इनके यथायोग्य लक्षणों का विभाग लूताईशश्च सर्वोऽपि ददुमंडलसंनिभः । करना चाहिये। सितोसितोरणःपीतःश्यावो वा मृदुरुन्नतः असाध्य के लक्षण । मध्ये कृष्णोऽथवा श्यावः पर्यतेजालकावृतः असाध्यायां तु हन्मोहश्वासहिमाशिरोरुजः विसर्पवाश्छोफयुतस्तप्यते बहुवेदनः।.. श्वेताःपीतासितारतापिटिकावयया. ज्वराशुपाकविक्लेदकोथावदरणान्वितः। वेपथुर्वमथुर्दाहस्तृडांध्यं घनासता ५२ र | क्लेदेन यत्स्पृशत्यंगं तत्राऽपि कुरुते ब्रणम् । श्यावोष्ठयक्त्रदंतत्वं पृष्ठावावभंजनम् ।। अर्थ-सब प्रकारकी मकडियोंसे काटा पकवूसवर्ण च दंशात्रवति शोणितम् । हुआ स्थान दादके चकत्ते के समान होजाताहै ___ अर्थ-असाध्य मकडी के काटने से यह सफेद, काला, लाल पीला वा श्याववर्ण हृदय में मोह, श्वास, हिचकी, शिरोवेदना का होता है, यह कोमल, ऊंचा, बीच में देह में सफेद, पीली, काली वा काले रंग काला वा श्याववर्ण, किनारों पर जाल से की सूजनको उत्पन्न करने वाली फुसियां पैदा होजाती हैं, कंपन, हलास, दाह, तृषा आवृत, होता है । यह विसर्पवान,शोथयुक्त आंखों के आगे अंधेरी, नाक का टेढापन, उत्तप्त, वहु वेदनान्वित, तथा ज्वर, शीघ्र भोष्ठ मुख और दांतों में कालापन, पीठ | पाकता, विक्लेद, सडाहट और अवदरण से और प्रीवा में टूटने कीसी वेदना होती है, युक्त होता है । लूताके डंकका चेप शरीरमें तथा दंश में से पकी हुई जामन के रंगका जहां जहां लगता है वहांही व्रण होजाता है। मकडीकेश्वास से विषवमन । रक्त निकलता रहता है। श्वासदंष्ट्राशचन्मृत्रशुक्रलालानखार्तवैः ५८ असाध्य के तीन भेद । अष्टाभिरुद्धमत्येषा विषं वक्तैर्विशेषतः । सर्वापि सर्वजा प्रायो ब्यपदेशस्तु भूयसा। - अर्थ- सब प्रकारकी मकडियां त्रिदोषज ___ अर्थ-मकडी श्वास, डाढ, विष्टा, मूत्र, होती हैं, परन्तु दोषकी अधिकता से इन वीर्य, लार, नख और आर्तव इन आठ के तीन भेद होगये हैं, यथा-वातिक, पदार्थ द्वारा और विशेषकर के मुखसे विष पैत्तिक और कफज । का वमन करती है । अर्थात् इन आठ रीति मकडी के दंश के लक्षण। से मकडी का विष निकला करता है । तीक्ष्णमध्यावरत्वेनसा त्रिधा हत्युपेक्षिता। मकडीआदि के दंशस्थान । सप्ताहेन दशाहेन पक्षेन च परं क्रमात् । । लूता नाभेर्दशत्यूयमूर्घ वाऽधश्च कीटकाः For Private And Personal Use Only
SR No.020075
Book TitleAshtangat Rudaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVagbhatta
PublisherKishanlal Dwarkaprasad
Publication Year1867
Total Pages1091
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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