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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra अकबर की धार्मिक नीति दूसरा उधर जाता तो यह बड़ा दोष है । अत: हमको चाहियें कि हम सब को एक करदें, परन्तु इस प्रकार कि वे स्कता के साथ एक और सम्पूर्ण हो ताकि किसी धर्म के गुण से वे वंचित न रह जाये एक धर्म साथ उन्हें दूसरे धर्म की अच्छाई का भी लाभ मिल जाय. .. के गुण के साथ इस प्रकार ईश्वर का सम्मान होगा, लोगों को शान्ति प्राप्त होगी और साम्राज्य की रक्षा होगी । ३ अत: अकबर ने विभिन्न धर्मो के सत्य तथा महत्व पूर्ण सिद्धान्त अपने मस्तिष्क में संकलित कर लिये और फिर उन्हें लिपिबद्ध करा लिया । इनमें सब धर्मों का समन्वय था, जो कि दोन हलाड़ी के नाम से विख्यात हुआ । दीन इलाही का स्वरूप : ► Akad me qe mbro - www.kobatirth.org th मुसलिम इतिहासकार तथा कटटर धर्मान्य मुल्ला बदायूंनी ने दोन इलाही को एक नया धर्म माना है । स्मिथ ने भी इसे एक नया धर्मं माना 5 --- He says-Akbar's long-Cherished project of establishing throught his empire one universal religion, formilated & Controlled by himself, was avowed publicly for the first time in 1582," एस०आर० शर्मा का मत है कि ^^ उसने अपनी प्रजा के दोनों मुख्य वर्गी (हिन्दू और मुसलमान ) के पारस्परिक मतभेदों को मिटाने का यत्न किया । उसने दोनों जातियों में परस्पर विवाद की प्रथा का उदाहरण उपस्थित किया । उऊंचे पद और उपाधियों देने में उसने सबको बराबर समझा और सब से बड़ा काम उसने यह किया कि एक नया घ चलाया जिससे एक नये संसार की सृष्टि होगी । .. ' Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 3- According to Bartoli quoted from Smdth: Akbar the great Magul P,211-12 14 Smith : Akbar the great Mogul P. 209. एस. बार शर्मा हिन्दी अनुवादक मथुरालाल शर्मा For Private And Personal Use Only 103 भारत मैं मुगल साम्राज्य पृ० २६८
SR No.020023
Book TitleAkbar ki Dharmik Niti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNina Jain
PublisherMaharani Lakshmibhai Kala evam Vanijya Mahavidyalay
Publication Year1977
Total Pages155
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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