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Jaina Literature and Philosophy
[1459.
Subject.— The daily duties of the Jaina laity explained in Gujarāti.
For details see "ends " of No. 1460. The प्रतीकs of the
sūtras are given. Regins.-.fol. 14 श्रीगुरुभ्यो नमः ॥
प्रणम्य श्रीजिनाधीशं सद्गरं च प्रमोदतः।
श्राद्धाहोरात्रकृत्यानि लिख्यते लोकभाषया ॥१॥ तिहां प्रथम प्रभातसामायिकविधि लिखीयै छै । श्रावक बै घडी पाछिली रातें पोसहशालायें अथवा गुरु समीपैं अथवा गृहनें एक देशैं आवी प्रथम दिवस संध्याय पडिलेह्या वस्त्र पहिरी गुरुसंयोग न हुवै तो आपप्रमार्जित स्थनथें । तीन नवकार गुणी थापनाचार्य था पछै प्रथम खमासमण देई कह इच्छाकारेण संदिसह भगवन सामायिक मुहपोत्ती पडिलेडं गुरु कहै पडि
लेहेह । etc. Ends.-- fol. 24° इति छम्मासीतपचिंतनविधिः ॥ दोहा ।
श्रीजिनचंद्रसुर्रिद नितु राजत गच्छराजान । वाचक अमृतधर्मगणि सीस क्षमाकल्यान ॥१॥ सय अढार अडतीस मझि 'जेसलमेरु' सुथांन ।
श्रावकविधिसंगह कीयौ मूलग्रंथ अनुमान ॥२॥ कमलादिम सुंदर सुमन कीध सहाय प्रधान ।
जो फुनि होइ अशुद्ध इह सो सोधियो सुजान ॥३॥ इति श्रावकविधिप्रकाशः परिपूर्णतामगात् ॥ संवत् १८३९ । आसूवदि ७
दिने शनिवारे लिषतं ॥ 'जेसलमेर'दुर्गे ॥ श्रीः । श्रीः ॥ Reference.-- See SHJL (pp. 676-677 ).
श्राद्धाहोरात्रकृत्य
Śrāddhāhorātrakrtya
854. No. 1460
1892-95. Size.-- 9 in. by 48 in. Extent.- 23 folios; Io lines to a page; 33 letters to a line. Description.- Country paper somewhat thick, tough and white;
Jaina Devanagari characters; sufficiently big, quite legible, uniform and beautiful hand-writing; borders ruled in
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