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Jaina Literature and Philosophy
[1381.
महावीरकलश
Mahāyirakalasa No. 1381
1270 (39).
1887-91. Extent.-- fol. I; to fol 14. Description.--- Complete; 8 verses in all. For other details see
No. 731. Author.-- Not mentioned. Subiect. -- Abhiscka of Lord Mahavira at the time of his birth by
the Indras is dealt with in this metrical composition in
Apabhrainsa (?) Begins.-- fol. 13* ॥ ६ ॥
जम्ममज्जाणि जिणह वीरस्स । पारद्धयसुरगणाण। 'मेरु सिहरि इंदेण चिंतिउ । किम सुइिसइ तुच्छतु(त)णु | जलपवाहु सुर खित्तिइ तिओ । पुण अमुण वि जिणबलु कलवि | इओ चिंतितु सुरिंदु । लीलइ चालिउ वीरजिाण वामकमग्गि
गिरिंदु ॥१॥ खुभियजल निहिदलिओ महिवट्ट लह दिग्गइ विमिलिय तियसकं पि कंपिउ ।
सहसक्किरिगउ गिरि वि वीर मेस जं चलिाण चंपिउ । पवियंभिउ निभरभुवणि । अणवविय संखोहु ते खणि सयलजगजियह । उप्पाइ
RII etc. Ends.- fol. 14
संति संघह संति नयरस (? ह) । संति होउ जिणवणियवग्गह । इह देसह नरवरह संति होउ जिणन्हवणि लग्गह । नंद दुरावलि अवहरउ सोलह विजाए वि। नवगह दुरिउ अवहरउ । ननिगु भणइ न्हवेउ । जलिहि महाजलकल्लोलवाल्लउच्छलियनीरपपारा । जिणन्हवणं कुणउ सया । महानई निम्मिया तुज्झ । अहिणवेहि कणयकलसेहि खीरोयभरिएहि सुरवरेहिं करियलि धरेविणु । अहिसित्तउ वीरजिणु 'मेरु' सिहरि जय जय भणेविणु ॥ ७ ॥ बालतणमि सामिय । 'सुमेरु सिहरमि कणयकलसेहिं । तियसासुरेहि न्हविउ । ते धन्ना जेहि (हिं) दिट्रो सि ॥ ८ ॥
इति श्रीमहावीरकलश ॥ छ ।।।
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