________________
192
Jaina Literature and Philosophy
[1363.
Begins.~~ ( com. ) fol. 12 मुहपती पडिलेहवड करी वांदणा देवइ संबद्धा गीतार्थ पांच साधुनें बामणा करे चोमासे संबच्छरीइ ७ सुधां । मे तिम आठ गुरु दा प्रत्येक बामणा करइ बांदणा देइ पार्षासूत्र कहइ वली बेसी पडिकमणा सूत्र कहइ ओ ( ऊ ) ठीने etc.
Ends. -- ( text ) fol. 12a
"
-
(com. 1.) fol. 12b एह विध पाषी पडिकमणाना चउमासीसानी संवछरीना पडीकमणानी पणि एहविध इति पाषी प्रतिक्रमणानी विधि कही ते जाणवी ।
सुत्तं अभुट्टा | उस्सग्गो पोत्तिबंदणं तह [ ए ]य |
1
पज्जंत्तखामणाणि अ । एस ( स ) विही पक्ख ( क्खि ) पडिकमणे ॥ २ ॥ इतिपक्षि (खि) प्रतिक्रमणविधि
पौषधग्रहण विधि ( पोसहग्गहणविहि )
Pauṣadhagrahanavidhi
( Posahaggahanavihi )
No. 1364
Size --- leaf 47b.
Description - Complete. For further details see अरिहणास्तोत्र 1392 (1). 1891-95.
No.
Jain Education International
1392 ( 42 ).
1891-95.
Subject.-- A ritual associated with taking up a pāusadha, a tem - porary monk-hood.
Begins.— leaf 47° अथ पौषधग्रहणविधिः ॥ मुहपोत्तिं पडिलेहेऊण खमा । इच्छाकारेण संदिसह पोसहु संदिसावह | etc.
Ends.-~ leaf 47° तस्स भंते पडिक्कमामि । गरहामि । अप्पाणं वोसिरामि ॥ छ ॥
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org