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( १२७ )
ऋषभदत्त से यह बात सुनकर देवानंदा वड़ी प्रसन्न यावत् उल्लसित हृदय वाली हुई । और दोनों हाथ जोड़, मस्तक पर अंजली करके ऋषभदत्त ब्राह्मण के इस कथन को विनयपूर्वक स्वीकार किया ।
इसके बाद वह ऋषभदत्त ब्राह्मण देवानंदा ब्राह्मणी के साथ धार्मिक श्रेष्ठ रथ पर चढ़ा हुआ और अपने परिवार से परिवृत्त, ब्राह्मणकुंड ग्राम नामक नगर के मध्य में होता हुआ निकला और बहुशालक उद्यान में आया । तीर्थङ्कर भगवान् के छत्र आदि अतिशयों को देखकर उसने धार्मिक श्रेष्ठ रथ को खड़ा रखा और नीचे उतरा । रथ पर से उतर कर वह श्रमण भगवान महावीर के पास पाँच प्रकार के अभिगम से जाने लगा । वे अभिगम इस प्रकार है
करना,
(१) सचित द्रव्य का त्याग करना,
(२) अचित्त द्रव्य का त्याग नहीं करना अर्थात् वस्त्रादि को समेट कर व्यवस्थित
( ३ ) विनय से शरीर को अवनत करना ( नीचे की ओर झुका देना ),
(४) भगवान् के दृष्टिगोचर होते ही दोनों हाथ जोड़ना और
(५) मन को एकाग्र करना ।
इन पाँच अभिगम द्वारा जहाँ श्रमण भगवान् महावीर स्वामी हैं, वहाँ आई और भगवान् को तीन बार आदक्षिण- प्रदक्षिणा करके वंदन - नमस्कार किया ।
वंदन - नमस्कार करने के बाद ऋषभदत्त ब्राह्मण को आगे कर अपने परिवार सहित शुश्रूषा करती हुई और नत बनकर सन्मुख स्थित रही हुई, विनयपूर्वक हाथ जोड़कर उपासना करने लगी ।
(ख) देवाणंदा के स्तन से दूग्धधारा बह निकली
तपणं सा देवाणंदा माहणी आगयपण्हया पप्पुयलोयणा संवरियवलयबाहा कंचुयपरिक्खित्तिया धाराहयकलंबगं पिव समूसवियरोमकूवा समणं भगवं महावीरं अणिमिसाए दिट्ठीए देहमाणी- देहमाणी चिट्ठइ ॥ १४७॥
भंतेति ! भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी - किंणं भंते! एसा देवाणंदा माहणी आगयपण्हया, तं चेच x x x रोमकूपा देवाणुष्पियं अणिमिसाए दिट्ठीए देहमाणी-देहमाणी चिट्ठर ?
गोमादि ! समणे भगवं महावीरे भगवं गोयमं एवं वयासी - एवं खलु गोयमा ! देवाणंदा माहणी ममं अम्मगा, अहणणं देवानंदाए माहणीए
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