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________________ पतद्ग्रह] ६५८, जैन-लक्षणावली [पथ्य वचन विमुच्याग्रतः पर्यटति सा पतङ्गवीथिका। पतङ्गः ३. पत्तनं जलपथोपेतमेव स्थलपथोपेतमेव वा । शलभः, तस्येव या वीथिका पर्यटनमार्गः सा पतङ्गवी- (औपपा. अभय. वृ. ३२, पृ. ७४) । ४. पत्तनानि थिका, पतङ्गो हि गच्छन्नुत्प्लुत्योत्प्लुत्यानियतया जल-स्थलमार्गयोरन्यतरेण मार्गेण युक्तानि। (कल्पगत्या गच्छति, एवं गोचरभूमिरपि या पतङ्गोड्डय- सू. वि. वृ. ८८, पृ. १११)। नाकारा सा पत वीथिकेति भावः । (बहत्क. क्षे. १ जहां नाव के द्वारा और पावप्रचार से (पैदल) वृ. १६४६)। जाना होता है उसे पत्तन कहते हैं। २ जलमार्ग से जिस गोचरभूमि में साधु तीन-चार घरों को छोड़ अथवा स्थलमार्ग से युक्त प्रदेश को पत्तन कहते हैं। कर आगे जाता है वह पतंगवीथिका गोचरभूमि दूसरे कितने ही आचार्य रत्नों की भूमि को पत्तन कहलाती है। जैसे पतंगा उछल उछल कर अनियत कहते हैं। गति से गमन करता है उसी प्रकार गोचरी के पत्नी-पत्नी पाणिग्रहीता स्यात् xxx ॥ लिए जाते हुए अनियत गति से जाना—कभी (लाटीसं. २-१७८)। किसी गृह में तो कभी अन्य गृह में, इस प्रकार से जिसके पाणि (हाथ) को ग्रहण किया गया हैअनियमित प्रवेश करना; इसे पतंगवीथिका गोचर- जिसके साथ विधिपूर्वक विवाह हुअा है-उसे पत्नी भमि कहते हैं । यह क्षेत्राभिग्रहविषयक ऋज्वी कहा जाता है। प्रादि पाठ गोचरभूमियों में चतुर्थ है। पत्र-असिद्धावयवं वाक्यं स्वेष्टस्यार्थस्य साधकम् । पतद्ग्रह- १. परिणमयइ जीसे तं पगईइ पडिग्गहो स. गुगूढपदप्रायं पत्रमाहुरनाकुलम् ॥ xxx एसो। (कर्मप्र. सं. क. २)। २. परिणमयति मुख्यशब्दात्मकं वाक्यं लिप्यामारोप्यते जनः। पत्रजिस्से तं पगतीए पडिग्गहो एसो-यस्यां प्रकृतौ स्थत्वात्तु तत्पत्रमुपचारोपचारतः ॥ अथवा प्रकृतजीवस्तद्भावेन परिणमयति सो प्रकृतिः पगतीए वाक्यस्य मुख्यत एव पत्रव्यपदेश इति निगदामः, संकममाणाए पडिग्गहो वुच्चति । (कर्मप्र. च. सं. क. पदानि त्रायन्ते गोप्यन्ते रक्ष्यन्ते परेभ्यः प्रतिवादिभ्यः २)। ३. यस्यां प्रकृतौ आधारभूतायां तत्प्रकृत्यन्त- स्वयं विजिगीषुणा यस्मिन् वाक्ये तत्पत्रमिति पत्ररस्थं दलिकं परिणमयति आधारभूतप्रकृतिरूपतामा- शब्दस्य निर्वचनसिद्धेः । xxx त्रायन्ते वा पदापादयति एषा प्रकृतिराधारभूता पतद्ग्रह इव पतद्- न्यस्मिन् परेभ्यो बिजिगीषुणा। कुतश्चिदिति पत्रं ग्रहः, संक्रम्यमाणप्रकृत्याधार इत्यर्थः । (कर्मप्र. स्याल्लोके शास्त्रे च रूढितः ।। (पत्रप. प.१-२)। मलय. वृ. सं. क. २)। जो प्रसिद्ध अवयवों से युक्त वाक्य अपने अभीष्ट १जीव जिस प्रकृति में विवक्षित प्रकृति के प्रदेशों अर्थ का साधक होता है तथा जिसमें प्रायः भली को तप से परिणमाता है उस प्रकृति को पतद्- भांति पदों की गूढ़ा हो वह पत्र माना जाता है। ग्रह प्रकृति कहते हैं। पत्रचारण-१. अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बहपतनान्तराय-भूमौ मूर्छादिना पाते पतनाख्यो विहाण पत्ताणं । जा उवरि वच्चदि मुणी सा सिद्धी Xxx। (अन. ध. ५-५४)। पत्तचारणा णामा ॥ (ति. प. ४-१०४०) । पाहार करते समय मूर्छा आदि के कारण भूमि २. नानावृक्ष-गुल्म-वीरुल्लताविताननानाप्रवालतरुणमें गिर जाने पर पतन नाम का अन्तराय होता है। पल्लवालम्बनेन पर्णसूक्ष्मजीवानविराधयन्तश्चरणोपति-पाति रक्षति तामिति पतिः। (उत्तरा. नि. त्क्षेप-निक्षेपपटवः पत्रचारणाः। (योगशा. स्वो. विव. शा. वृ. ५७, पृ. ३८)। १-६, पृ. ४१)। ३. पत्रमस्पृश्य पत्रोपरि गमनं जो उसकी-भार्या (स्त्री) की--रक्षा करता है पत्रचारणत्वम् । (त. वृत्ति श्रुत. ३-३६) । वह पति कहलाता है। १ जिसके प्रभाव से मुनि पत्रगत जीवों की विरापत्तन-देखो पट्टन । १. नावा पादप्रचारेण च यत्र धना न करके उनके ऊपर से गमन करता है उसका गमनं तत्पत्तनं नाम । (धव. पु. १३, पृ. ३३५)। नाम पत्रचारण ऋद्धि है। २. पत्तनं जलपथयुक्तं स्थलपथयुक्तं वा, र नभूमि- पथ्य वचन-पथ्यं यदायतौ हितम्। (योगशा. रित्यन्ये । (प्रश्नव्या. अभय. वृ. पृ. १७५)। स्वो. विव. १-२१, पृ. १२०) । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.016022
Book TitleJain Lakshanavali Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1978
Total Pages452
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size12 MB
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