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________________ गणिनी आर्यिकारत्न श्री ज्ञानमती अभिवन्दन ग्रन्थ [२२३ हाँ ! हाँ उस यूनिवर्सिटी में, डिग्री भी मिलती है । मुनि आर्यिका की पदवी भी मिलती है । श्रावक-श्राविकाओं की किस्मत सुधरती हैं । बालक-बालिकाओं की बुद्धि निखरती है । मुझे भी उसी ज्ञानमती यूनिवर्सिटी में पढ़ने का सौभाग्य मिला है । श्रावक की डिग्री लेने का भाग्य खिला है अब मैं उस माँ के, श्री-चरणों में शीश नमाता यही कामना करता हूँ । आगे की डिग्री लेने की हार्दिक भावना रखता हूँ । "बालब्रह्ममय जीवन आपका, जीवन ज्योति जगाता है ।" - वाणीभूषण संहितासूरि प्रतिष्ठाचार्य पं० कमल कुमार जैन गोइल्ल [कलकत्ता] [१] बाल ब्रह्ममय जीवन आपका, जीवन ज्योति जगाता है । स्पर्शन विषय कषाय नहीं है, शान्ति सुधा उपजाता है । काय कान्ति भी ब्रह्मचर्य की, अनुपमता प्रकटाती है । वाणी में भी ओजस्विता, ब्रह्मचर्य की गरिमा से ही आती है। [२] ब्रह्मचर्य की निर्मलता से, बुद्धि वृद्धिता प्रकट हुई । साहित्य-सृजन की अनुपम महिमा, ब्रह्मचर्य से सुघट हुई ॥ व्यवहार दृष्टि से जीवनदाता, ब्रह्मचर्य को माना है । निश्चय दृष्टि से आत्म रूपमय, ब्रह्मचर्य को जाना है ॥ __ [३] आर्यिका रत्न श्री ज्ञानमति जी, आर्य भाव से भावित हैं । गणिनी हैं ये आर्यागण की, गण्य भावना साधित हैं । सिद्धान्त शास्त्र की प्रवर प्रवक्त्री वाचस्पति पद की धात्री हैं । न्याय प्रभाकर पद को भर्ती, न्याय प्रवचन की की हैं । [४] तिरागता की भव्य मूर्ति हैं, रहती रागभोग से कोशों दूर । निर्मोह भाव की सम्पति हैं. वे ज्ञान भाव से भरपूर ॥ Jain Educationa international For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012075
Book TitleAryikaratna Gyanmati Abhivandan Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavindra Jain
PublisherDigambar Jain Trilok Shodh Sansthan
Publication Year1992
Total Pages822
LanguageHindi
ClassificationSmruti_Granth
File Size26 MB
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