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________________ नियम, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, संयम और विनय का मूल है - अतः पूरा बोध हो सकता है । इस प्रकार सब तत्त्वों में समन्वय की जो इसका पालन करते हैं देवता भी उनके आगे नतमस्तक हो । खोज करना, व भिन्नता में अभिन्नता का दिग्दर्शन करना ही जाते हैं। अनेकान्त है। म यहाँ भी समन्वय की ओर उन्मुख होते हुए भी उन्होंने गृहस्थ हातमा वर्तमान समाज में पारस्परिक झगड़ों का एक महत्त्वपूर्ण व के लिए स्व-दारा सन्तोष तथा अपनी पत्नी के प्रति ईमानदारी की मूल कारण यह भी रहा है कि दूसरों के सही दृष्टिकोण का भी बात कही । स्वदारासन्तोष जहाँ समाज के शील और शिष्टाचार अनादर करना । अनेकान्तवाद समस्त मतवादों के समन्वय का की रक्षा करता है वहीं सामाजिक सुव्यवस्था बनाए रखता है, मध्यम मार्ग है क्योंकि वह सत्य से परिचित है । अनेकान्तवाद मनुष्य को पशु होने से बचाता है साथ ही विषय भोगों के प्रति माननीय विचार धारा का एक वैज्ञानिक उन्मेष है जो आग्रह और अनासक्ति से स्वास्थ्य की भी रक्षा होती है। आतंक के इस वातावरण में भी तत्त्व को, सत्य को समझने की मक वास्तव में यह ब्रह्मचर्य धर्म ध्रुव है, शाश्वत है, जिनावदेशित सूक्ष्म दृष्टि देता है। अनेकान्त वाद जहाँ दार्शनिक तथ्यों को लेकर है। महावीर के व्यक्तित्व का सर्व प्रधान गुण ही उनका अनन्तवीर्य होने वाले वाद-विवादो और संघर्षों का अंत करने में समर्थ है वहीं होना तथा मन-वचन-कर्म से संयमित होना ही था । आचरण के आचरण और व्यवहार को भी सरल व सरस बनाने में कम सफल समन्वय का यह अनुपम उदाहरण है । विश्व कल्याण के लिए, नहीं |णि नैतिकता के निखार के लिए यह अमृत तुल्य है। वर्तमान समय में विश्व की बहुत सारी समस्याओं का विचार के द्वारा समन्वयवाद समाधान महावीर के समन्वयवाद से - अनेकान्तवाद से हो सकता है - कि कौन किस अपेक्षा से बातकर रहा है - यह सम्यक् ज्ञान भगवान महावीर ने अहिंसा, संयम व तप के द्वारा जहां सम्यक् समाधाम बन सकता है । इतिहास साक्षी है, एकान्तवाद ने आचरण को, अपरिग्रह के द्वारा व्यवहार को समन्वित किया वहीं हिंसा को प्रश्रय दिया है अशांति को - आतंक को प्रश्रय दिया है चिन्तन व दर्शन के क्षेत्र में समन्वय की प्रतिष्ठा के लिए अनेकान्त वहीं अनेकान्त ने शान्ति को, कल्याण को तथा अहिंसा को जन्म का दीप जलाया । दिया है । आग्रह, पक्षपात और एकान्त द्रष्टिकोणों के आधार पर अनेकान्त का अर्थ है - अनेक अन्त - वस्तुका सर्वतोन्मुखी सामूहिक जीवन कभी शान्त नहीं हो सकता, सुखी नहीं हो विचार । जगत का प्रत्येक पदार्थ अनन्त गुणात्मक है । जल, मनुष्य सकता। की प्यास बुझाता है पर हैजे के रोगी के लिये विषतल्य है; दूध आज जो - प्रत्येक परिवार में, समाज में, धर्मों में, संस्थानों स्वास्थ्य के लिए अमृत है पर अतिसार रोगी के लिए मृत्यु का में राष्ट्र व अन्तरराष्ट्रीय क्षेत्रों में - संघर्ष है, मनोमालिन्य है, कटुता कारण | राम दशरथ के पुत्र थे, लव कुश के पिता व सीता के व तनावपूर्ण व्यवहार है . वे सारे असहिष्णुता-प्रसूत है | उनकी पति । अर्थात् एक में अनेक आभास | यह बोध ही धर्म व दर्शन एकही कमी है - समन्वय का अभाव । भगवान महावीर का का उद्देश्य है । और यही महावीर का अनेकान्तवाद | मिट्टी का समन्वयवाद वह कांक्रीट है जो समस्त टुकड़ों को जोड़ सकता है, एक कण अनन्त स्वभावों का मिश्रण है । मिट्टी से ही तीखी, वह शीतल जल है तो अशांति के दावानल को शांत कर सकता है, कड़वी, मीठी अनेक प्रकार की वस्तुएं उत्पन्न होती हैं - वास्तव में वह सेतुबन्ध है जो अनेकानेक किनारों को-तटों को जोड़ सकता है, मिट्टी तो एक ही है पर बीज अपने स्वभावानुकूल अभीष्ट तत्त्वों समीकरण का वह सूत्र है जो विश्वकी समस्त समस्याओं का को खींच लेते हैं । ऐसी स्थिति में मिट्टी के कणों को कडुआ, मीठा समाधान कर विश्व को शांति और कल्याण के प्रवास की दिशा या तीखा कहना अज्ञानता है | तात्पर्य यह कि प्रत्येक वस्तु के प्रदान कर सकता है। अनेक स्वभाव होते हैं अतः सभी स्वभावों कोजानकर ही वस्तु का मधुकर-मौक्तिक हमारे अपने जीवन में दर्पण का बड़ा महत्त्व है। दर्पण में हम अपनी मुखछवि देखते हैं। चेहरे पर यदि कोई गन्दगी हो, तो दर्पण में वह दिखायी देती है | दर्पण में देख कर हम अपने मुँह को साफ रख सकते हैं | अरिहंत परमात्मारुपी दर्पण हमारे सामने है। इस आईने में हमारा सम्पूर्ण जीवन प्रतिबिम्बित हो सकता है। इस आईने में देखकर हमारे जीवन की मलिनता हमें दूर कर लेनी चाहिये । पर हम इस आईन में देखते ही नहीं हैं । आत्म-निरीक्षण करने की हमें आदत नहीं है | आईना हमारे सामने है, पर हम आईने में देखते नहीं हैं। इसमें आईने का क्या दोष है ? आईने का कोई दोष नहीं, दोष हमारा स्वयं का है। हम देखकर भी अन्धे बनते हैं। -जैनाचार्य श्रीमद् जयंतसेनसूरि 'मधुकर' श्रीमद् जयन्तसेनसूरि अभिनन्दन ग्रंथ / विश्लेषण (६२) जन्म मरण का चक्र यह, चलता जग में जान । जयन्तसेन प्रेम सुधा, अमर करे नित प्राण || www.jainelibrary.org Jain Education International For Private & Personal Use Only
SR No.012046
Book TitleJayantsensuri Abhinandan Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSurendra Lodha
PublisherJayantsensuri Abhinandan Granth Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages344
LanguageHindi, English
ClassificationSmruti_Granth & Articles
File Size88 MB
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