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________________ ‘પૂથ ગુરુદેવ કવિવટ પ. નાનrટેજી મહારાજ જમશતાહિક अहमंसि, पच्चत्थिमाओ वा दिशाओ आगओ अहमंसि, उतराओ वा दिशाओ आगओ अहमंसि, उडढाओ वा दिशाओ आगओ अहमंसि, अहो दिशाओ वा आगओ अहमंसि, अण्णयरीओ वा दिशाओ, अणुदिसाओ वा आगओ अहमंसि । एवमेगेसि णो णायं भवइ, अस्थि मे आया उवववाइए, णत्थि मे आया उवाइए के अहमंसि ? के वा इओ चओ इहं पेच्चा भविस्सामि । आचारांग प्र. श्रु. प्र. अध्ययन प्रथमसूत्र: श्री सुधर्मा स्वामी अपने प्रिय शिष्य जम्बू से कहते हैं कि हे आयुष्मान जम्बू। मैंने सुना हैं उन भगवान् महावीर ने इस प्रकार प्रतिपादन किया है कि इस संसार में कई जीवों को यह ज्ञान नहीं होता कि- मैं पूर्व दिशा से आया हूँ या दक्षिण दिशा से आया हूँ। पश्चिम दिशा से आया हूँ या उत्तर दिशा से आया हूँ। मै उर्ध्वदिशा से आया हूँ या अधोदिशा से आया हूँ। किसी एक दिशा या विदिशा से आया हूँ। कई जीवों को यह भी ज्ञात नहीं होता कि मेरी आत्मा जन्मान्तर में संचरण करने वाली है या नहीं? मैं पूर्व जन्म में कौन था? यहां से मरकर दूसरे जन्म मे क्या होऊंगा?' उक्त आगमिक उद्धरण से यह सिद्ध होता है कि जैनदर्शन आत्मतत्त्व की आधार शिला पर प्रतिष्ठित है। . ___'जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ' जो एक आत्मा को जान लेता है वह सब कुछ जान लेता है। यह कह कर जैन दर्शन ने आत्मा के सर्वांग महत्त्व को स्वीकार किया है। 'अप्पा सो परमप्पा' आत्मा ही परमात्मा है। आत्मा में परमात्मा का निवास है। आत्मा से परमात्मा बनना ही आत्मा की मंजिल है। आत्मा किस प्रकार और किस क्रम से आध्यात्मिक विकास करता है तथा विकास के दौरान वह किन किन अवस्थाओं का अनुभव करता है, यह जानने की सहज जिज्ञासा अध्यात्मप्रेमियों को होती है। इस जिज्ञासा को शास्त्रकारों ने ‘गुणस्थान' के माध्यम से शान्त करने का महान् उपकार किया है। गुणस्थान का स्वरूप __आत्मविकास की क्रमिक अवस्थाओं को जैन परिभाषा में गुणस्थान कहा जाता है। मुक्तिरूपी महल के लिये ये सोपान रूप हैं। आत्मा की अविकसित अवस्था से पूर्ण विकसित अवस्था की मंजिल पर पहुंचने हेतु ये अन्तर्वर्ती विश्राम स्थल : पड़ाव : है। ये आत्मिक व्यक्तियों के आविर्भाव की तरतमभाओंपन्न अवस्थाएं हैं। जैन दृष्टि के अनुसार आत्मा का मौलिक स्वरूप शुद्ध चेतनामय है । अनन्तज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त शक्ति रूप-अनन्तचतुष्टय उसका सहज स्वरूप है। जिस प्रकार सूर्य स्वभावतः तेजोमय प्रकाश-पिण्ड है उसी तरह आत्मा स्वभावतः ज्ञान और सुख का अनन्त एवं अक्षय निधान है। घने बादलों के कारण जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश आवृत और आच्छन्न हो जाता है तो उसका वास्तविक स्वरूप दृष्टिगोचर नहीं होता। इसी प्रकार जब आत्मा कर्मो के आवरण से आवृत्त हो जाता है तो उसका सही स्वरूप दृष्टिगोचर नहीं होता । बादलों के आवरणों के क्रमशः हटने पर सूर्य प्रकाश का आविर्भाव होता है और सर्वथा आवरणों के हटने पर सूर्य का वास्तविक स्वरूप प्रकट हो जाता है। इसी तरह ज्यों ज्यों कर्मो के आवरण शिथिल होते जाते हैं त्यों त्यों आत्मा का स्वरूप प्रकट होने लगता है। सर्वथा आवरणों के विलय होने पर आत्मा शुद्ध, बुद्ध और मुक्त हो जाता है और अपने मौलिक स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। जब आत्मा पर आवरणों की सबनता पराकाष्ठा पर होती है तब आत्मा प्राथमिक अवस्था में- अविकसित रूप में पड़ा रहता है और जब आवरण सर्वथा हट जाते हैं तो आत्मा पूर्ण शुद्ध स्वरूप में अवस्थित हो जाता है। ज्यों ज्यों आवरणों की तीव्रता कम होती जाती है त्यों त्यों आत्मा प्राथमिक अवस्था को छोड़कर क्रमवार आगे की और बढ़ता है, वह अपनी मंजिल पर आगे से आगे बढ़ता चला जाता है । अविकसित अवस्था से विकास की ओर अग्रसर होता हुआ आत्मा प्रथम और आत्मिक उत्क्रान्ति के सोपान Jain Education International ३५५ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012031
Book TitleNanchandji Maharaj Janma Shatabdi Smruti Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChunilalmuni
PublisherVardhaman Sthanakwasi Jain Shravak Sangh Matunga Mumbai
Publication Year
Total Pages856
LanguageGujarati, Hindi
ClassificationSmruti_Granth & Articles
File Size26 MB
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