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ज्ञानेन्द्रियों पर महामन्त्र जाप:
श्वास-प्रश्वास : महामन्त्र जपः-
सावधानता
णमो अरिहन्ता णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाण णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्व साहूणं
ग्रह-शांति : महामन्त्र जापः
णमो अरिहन्ताणं णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्व साहूणं
नमस्कार महामन्त्र : वैज्ञानिक दृष्टि : साध्वी श्री राजीमतीजी
सूर्य और मंगल
चन्द्र और शुक्र
बुध
गुरु
शनि, राहु और केतु
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- बांये कान पर - बांये नेत्र पर
- दांये नेत्र पर
-दांये कान पर -दोनों होठों पर
- श्वास भरते समय
- श्वास छोड़ते समय
- भरते समय
- छोड़ते समय
- भरते समय, छोड़ते समय
- ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ।
- ॐ ह्रीं णमो अरिहन्ताणं । - ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ।
- ॐ ह्रीं णमो आयरियाणं । - ॐ ह्रीं णमो लोए सव्व साहूणं ।
१ - माला को दाहिने हाथ में हृदय के पास रखते हुए धीरे-धीरे जप क्रिया जपें ।
२– एकान्त स्थान का ख्याल रखा जाये । यदि कहीं पाँच-पच्चीस व्यक्ति एक साथ बैठकर एक ही मन्त्र को एक लयपूर्वक जपते हों तो उनके साथ बैठा जा सकता है ।
३ - मन्त्र को सामान्यतया बदलना नहीं चाहिये ।
४- मन्त्र जप में निरन्तरता होनी चाहिए, क्योंकि लम्बा जप ही शरीर और चेतना के बीच एक नई हलचल पैदा करता है ।
५- प्रारम्भिक अभ्यास के दिनों में माला अवश्य रखी जानी चाहिये । इससे मानसिक प्रतिबद्धता रहती है । जैन और बौद्ध दोनों परम्पराओं में यह उल्लेख मिलता है। माता को यत्र-तत्र नहीं रखना चाहिए। एक दूसरे के बीच माला का आदान-प्रदान भी न हो । जिस माला से जप करते हैं उसे गले में नहीं पहनें ।
६ - मन्त्र जप बिना किसी कामना के होना चाहिए ।
७ - माला फेरते समय सजग रहें, अन्यथा अन्तर्मुखता के बहाने आप शून्य होते चले जायेंगे । सम्भव है एक दिन निष्क्रिय अचेतन मनोभूमि पर ही खड़े रह जायें । इसलिए लम्बे जप अनुष्ठान के समय बीच-बीच में श्वास- दर्शन करते रहें ।
८ - जप नियमित व निर्धारित संख्या में होना चाहिये । बीच-बीच में टूटने वाला जप यह प्रमाणित करता है कि जपकर्ता को अपने मन पर कोई नियन्त्रण नहीं है ।
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