________________
तापित-ताड़ित अभिशापित स्व. अधिकारों से भी वंचित यह देख अवस्था द्रवित हो गई फूट पड़ी बह चली मही मंडल पर करुणा प्रभु की।
ओ नारी! तू है दया की प्रतिमा! करुणा की निधि! क्षमा की ज्योति! स्नेह की पावन स्त्रोतस्विनी। हे प्रज्ञा धुरीण! अमित शक्ति को धरने वाली भूल गई क्यों अपने पन को? अपने बल को? तेरे भीतर सतीत्व का है तेज निराला गिरते पुरुषों को देकर सम्बल सत्य संयम का क्या नहीं, किया उत्थान। किया कल्याण। धर्मग्रन्थों के इतिहासों के पृष्ठ अनेकों
त्याग वीरता बलिदानों की गाथाओं से सजे हुए हैं। रंगे हुए हैं। गौरव मंडित होकर कैसे चमक रहे हैं, दमक रहे हैं इसने ही तो धराधाम पर राम, कृष्ण, बुद्ध महावीर से, लाल दिये हैं। इसीलिए तो पाया पद था रलकुक्ष धारिणी का सीता, अंजना, चन्दनबाला महासतियां जगदम्बा सरस्वती देवी स्वरूपा ये ही बनी हैं। इसी काल में मुक्तिधाम में प्रथम प्रवेश का उद्घाटन भी विश्व वत्सला मरुदेवी के ही हाथों हुआ था। नर-नारी के जुदे-जुदे परिलक्षित होते
(७७)
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org