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सागरमल जैन
स्थानांग एक संग्रह ग्रन्थ है और उनमें ईसा पूर्व से लेकर ईसा की चौथी शताब्दी तक की सामग्री संकलित है । प्रस्तुत सन्दर्भ किस काल का है यह कहना तो कठिन है, किन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि वह लगभग ईसा की प्रथम शताब्दी का होगा, क्योंकि तब तक जिन-मन्दिर और जिनस्तूप बनने लगे थे । उसमें वर्णित स्तूप जैन परम्परा से सम्बन्धित हैं । यद्यपि यह विचारणीय है कि मथुरा के एक अपवाद को छोड़कर हमें किसी भी जैन- स्तूप के पुरातात्त्विक अवशेष नहीं मिले हैं । ऐतिहासिक दृष्टि से विश्वसनीय जैन स्तूपों के साहित्यिक उल्लेख भी नगण्य हैं ।
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समवायांग एवं जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति में हमें चैत्यस्तूप के स्थान पर चैत्यस्तम्भ का उल्लेख मिलता है, साथ ही इन स्तम्भों में जिन अस्थियों को रखे जाने का भी उल्लेख है ।' अतः चैत्यस्तम्भ चैत्य- स्तूप का ही एक विकसित रूप है । जैन परम्परा में चेत्यस्तूपों की अपेक्षा चैत्यस्तम्भ बने, जो आगे चलकर मानस्तम्भ के रूप में बदल गये । आदिपुराण में मानस्तभ्भ का स्पष्ट उल्लेख है । जैनधर्म की दिगम्बर परम्परा में आज भी मन्दिरों के आगे मानस्तम्भ बनाने का प्रचलन है । शेष अंग-आगमों में भगवती सूत्र, ज्ञाताधर्मकथा और उपासकदशांग में हमें चैत्यस्तूपों के उल्लेख तो उपलब्ध नहीं होते हैं, किन्तु अरिहंत चैत्य का उल्लेख अवश्य मिलता है । यद्यपि ज्ञाताधर्मंकथा में स्तूपिका ( थूभिआ ) का उल्लेख अवश्य है । इतना निश्चित है कि इन आगमों के रचनाकाल तक जैन परम्परा में जिन - प्रतिमाओं और जिन-मन्दिरों का विकास हो चुका था । पुनः दसवें अंग-आगम प्रश्नव्याकरण में स्तूप शब्द का उल्लेख मिलता है, किन्तु उसमें उल्लिखित स्तूप जैन परम्परा का स्तूप नहीं है । सम्भवतः यहाँ ही हमें स्वतन्त्र रूप से स्तूप शब्द मिलता है, क्योंकि इसके पूर्व सर्वत्र चैत्य- स्तूप (चेइय-थूभ) शब्द का प्रयोग मिलता है । ज्ञातव्य है कि प्रश्नव्याकरण का वर्तमान में उपलब्ध संस्करण आगमों के लेखनकाल के बाद सम्भवतः ७वीं शताब्दी की रचना है । जैनधर्म में परवर्तीकाल में स्तूप - परम्परा पुनः लुप्त होने लगी थी । जैनधर्मं में न तो प्रारम्भ में स्तूप - निर्माण और स्तूप - पूजा की परम्परा थी और न परवर्ती काल में ही वह जीवित रही । मुझे तो ऐसा लगता है कि ईसा पूर्व की द्वितीय एवं प्रथम शताब्दी से लेकर ईसा की
१. सोहम्मे कप्पे सुहम्माए सभाए माणवए चेइयक्खंभे हेट्टा उवरि च अद्धतेरस अद्धतेरस जोयणाणि वज्जेत्ता मझे पणतीस जोयसु वइरामएस गोलवट्टसमुग्गएसु जिण सकहाओ पण्णत्ताओ ।
- समवायांग, ३५।५ ।
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२. मानस्तम्भमहाचैत्यद्रुमसिद्धार्थपादपान् प्रेक्षमाणो व्यतीयाय स्तूपांश्चाचितपूजितान् ॥
- आदिपुराण, ४१।२० ।
३ (अ). गणत्थ अरिहंस वा अरिहंत चेइयाणि वा अणगारे वा भावियप्पणो णीसाए उड़ढं उप्पयति जाव सोहम्मो कप्पो ।
( ब ). अरहंत चेइयाई वंदित्तए वा नमसित्तए वा ।
४ ( अ ). उज्जलमणिकणगर यणधूभिय... | (a) मणिभियाए ।
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- भगवती सूत्र, ३१२ ।
- उपासकदसांग, ११४५ ।
-ज्ञाताधर्मकथा, १1१८; ११८९ ।
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