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________________ २९२ : सिद्धान्ताचार्य पं० फूलचन्द्र शास्त्री अभिनन्दन ग्रन्थ अपने कालमें स्वयं होता है, ऐसी वस्तु व्यवस्था है । यही कारण है कि कारण और कार्यका लक्षण करते समय आचार्योंने यह वचन कहा है यदनन्तरं यद्भवति तत् तस्य कारणम्, इतरत् कार्यम् । जो जिसके बाद होता है वह कारण है और जो होता है वह कार्य है । कारण-कार्यका यह लक्षण जहाँ द्रव्य भावप्रत्यासत्ति वश उपादान- उपादेयमें घटित हो जाता है, वहाँ प्रतिविशिष्ट काल प्रत्यासत्तिवश बाह्य सामग्री और उसको निमित्त कर होने वाले कार्य में भी घटित हो जाता है । सर्वत्र प्रत्येक कार्यके प्रति जो व्यवहार हेतुको स्वीकार किया गया है, वह भी इसी आधारपर ही स्वीकार किया गया है । वह अन्य के कार्य में वास्तव में सहायक होता है या उसमें अतिशय उत्पन्न करता है, इस आधारपर नहीं । आगे इस विषयका विशेष रूपसे स्पष्टीकरण करेंगे । शंका--चारों अनुयोग द्वादशांग श्रुतके आधारपर निबद्ध हुए हैं । ऐसी अवस्था में आप द्रव्यानुयोग द्वारा प्ररूपित निश्चयनयके विषयको ही यथार्थ क्यों मानते हो ? चरणानुयोग और कारणानुयोग जो कि मुख्य रूप से कर्म और शुभाचारका कथन करते हैं, उनके इस कथनको यथार्थ क्यों नहीं मानते ? समाधान-ज्ञानावरणादि कर्म है और शुभाचार भी है, वे दोनों वास्तविक हैं, वे असद्भूत नहीं हैं । किन्तु ज्ञानावरणादिको जीवका कार्य कहना यह असद्भूत है । क्योंकि जीव शुभ अशुभ या शुद्ध जिस परिणामको करता है वह जीवका कर्म ( कार्य ) है और जीवके उन शुभ और अशुभ भावोंको निमित्त कर जो कार्मणवर्गणाएँ स्वयं ज्ञानावरणादि परिणामको प्राप्त होती हैं, वह पुद्गलका कर्म ( कार्य ) है । इसी तथ्यको समयसार कलशमें इन शब्दोंमें स्पष्ट किया है यदि पुद्गल कर्मको जीव नहीं करता, तो फिर उसे कौन करता है ? ऐसी आशंका होनेपर तीव्र वेग - वाले मोहका नाश करनेके लिए आचार्य कहते हैं कि सुनो ! पुद्गल ही अपने ज्ञानावरणादि कर्मका कर्ता है । यह वस्तुस्थिति है । कर्मशास्त्र भी ज्ञानावरणादिको पुद्गलमय ही प्ररूपित करता हैं । फिर भी उसे जीवका कार्य कहना यह असद्भूत होनेसे उपचरित है । इसी प्रकार शुभ या अशुभ जितने भी भाव होते हैं, वे जीवके ही भाव हैं । जीव ही परके लक्ष्यसे स्वयं ही उन्हें उत्पन्न करता है । यह कथन सद्भूत । फिर भी शुभाचारको मोक्षमार्ग कहना यह असद्भूत होनेसे उपचरित है, क्योंकि शुभाचा रसे सम्यग्दर्शनादिरूप स्वभाव पर्याय भिन्न है और उसकी उत्पत्ति भी स्वभावकी अराधना द्वारा तन्मय होनेपर ही होती है, शुभाचार और उनके बाह्य निमित्तोंको सतत लक्ष्य में रखनेसे नहीं । शंका- निश्चयनयके समान व्यवहार नयकी परिगणना श्रुतज्ञान में की जाती है । इसलिए उसका विषय असद्भूत कैसे हो सकता है ? समाधान - वह उपचरितको उपचरित रूपमें ही जानता है, इसलिए असद्भूत अर्थ उसका विषय बन जाता है । उदाहरणार्थ- 'ज्ञानावरणादि कर्मका कर्ता जीव है' यह उपचरित कथन है, व्यवहारनयसे ऐसा कहा जाता है । बाधा तो इसे यथार्थ माननेमें है । क्योंकि परमार्थसे वह जीवका कार्य न होकर पुद्गलका ही कार्य है और इसीलिए निश्चयनय इस कथनका अपरमार्थरूप होनेसे उसका निषेध ही करता है । शंका - जीवके राग, द्वेष, मोह और योगकी सहायतासे पुद्गलने ज्ञानावरणादिरूप कार्य किया, ऐसा मानना तो यथार्थ है ? Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012004
Book TitleFulchandra Shastri Abhinandan Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJyoti Prasad Jain, Kailashchandra Shastri
PublisherSiddhantacharya Pt Fulchandra Shastri Abhinandan Granth Prakashan Samiti Varanasi
Publication Year1985
Total Pages720
LanguageHindi
ClassificationSmruti_Granth & Articles
File Size18 MB
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