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________________ ..श्रीमद्विजयानंदसूरि कृत, कर तुं कहीये। निज़ जन सब तार्ये । हंमोसें अंतर रखना नाचश्ये ॥ रिषव ॥४॥ मुखमा जींचके बेशी रहेना, दीनदयालको ना चश्ये । हम तन मन गरो । वचनसें सेवक अपना कहे दश्ये ॥ रिषव ॥५॥ त्रिजुवन श सुहंकर वामी, अंतरजामी तुं कहीये । जब हमकुं तारो । प्रजुसें मनकी वात सकल कहीये ॥ रिषव ॥ ६॥ कल्पतरु चिंतामणी जाच्यो, आज निरासें ना रहीये । तुं चिंतित दायक । दासकी अरजी चितमें अढ गहीये ॥ रिषव ।। दीनहीन परगुण रस राची। सरण रहित जगमे रहीये । तुं करुणासिंधु दासकी करुणा क्यु नहि चित गहीये ॥ रिषव ॥७॥ तुम विन तारक को न दिसे, होवे तुमकुं क्युं कहीये । इह दिलमें गनी । तारके सेवक जगमे जस लहीये । रिषव
SR No.010857
Book TitleChaturvinshati Jinstavan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj
PublisherJain Shastramala Karyalay
Publication Year
Total Pages216
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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