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सोमसेनभट्टारकविरचितंसब संसारी जीवोंमें समता भाव करना, संयमके पालन करनेमें हमेशा शुभ-भावना करना और आर्त्त-रौद्र ध्यानका त्याग करना सामायिक है ॥ ६२ ॥
योग्यकालासनस्थानमुद्राऽऽवर्तशिरोनतिः।
विनयेन यथाजातकृतिकामल भजेत् ॥ ६३ ॥ योग्य काल, आसन, स्थान, मुद्रा, आवर्त और शिरोनति करता हुआ विनय-पूर्वक मुनियोंकी तरह निर्मल कृतिकर्म-आवश्यक क्रिया को करें॥ ६३॥
जीविते मरणे लाभेऽलाभे योगे विपर्यये ।
बन्धावरौ सुखे दुःखे सर्वदा समता मम ।। ६४ ॥ जीने-मरनेमें, लाभ-अलाभमें, संयोग-वियोगमें, शत्रु-मित्रमें और सुख-दुःखमें मेरे सर्वदा समता भाव है--किसीमें राग-द्वेष नहीं है । ६४॥
पापिष्ठेन दुरात्मना जडधिया मायाविना लोभिना, - रागद्वेषमलीमसेन मनसा दुष्कर्म यनिर्मितम् ।
त्रैलोक्याधिपते जिनेन्द्र भवतः श्रीपादमूलेऽधुना, - निन्दापूर्वमहं जहामि सततं वर्वर्तिषुः सत्पथे ।। ६५ ॥ पापी, दुरात्मा, जड़बुद्धि, मायावी, लोभी और राग-द्वेषसे मलीन इस दुष्ट मनने जिन खोटे कर्मोंका उपार्जन किया है उनको, हे तीन लोकके स्वामी जिनेन्द्र देव ! आपके चरणोंमें इस वक्त धिक्कारता हुआ त्यागता हूँ और सन्मार्गमें लगे रहनेकी कामना करता हूँ ॥६५॥
पडावश्यकसत्कर्म कुर्याद्विधिवदञ्जसा,
तदभावे जपः शुद्धः कर्त्तव्यः स्वात्मशुद्धये ।। ६६ ॥ श्रावकोंको विविध-पूर्वक निरन्तर घडावश्यक क्रियाएँ करनी चाहिए; तथा इनके अभावमें अपनी आत्माको निर्मल बनाने के लिए शुद्ध जप करना चाहिए ॥ ६६ ॥
सिद्धचक्रप्रसादेन मन्त्राः सिद्धयन्ति साधवः ।
तस्मात्तदग्रतो मन्त्रान्समाराध्य ततोऽर्चयेत् ॥ ६७ ।। , सिद्धचक्रके प्रसादसे मंत्र भले प्रकार सिद्ध होते हैं, इस लिए सिद्धचक्रके सन्मुख मंत्रोंकी आराधना करे और उसके बाद अर्चन-पूजन करे ॥ ६७ ॥
ऊर्ध्वाधो रयुतं सविन्दु सपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितं,
वर्गापूरितदिग्गताम्बुजदलं तत्सन्धितत्त्वान्वितम् । अन्तःपत्रतटेष्वनाहतयुतं हींकारसंवेष्टितं,
देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो वैरीभकण्ठीरवः ॥ ६८ ॥