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________________ ३७६. सोमसेनभाएकविरचित। . ... . . .. ...... ...... दांत उगे हुए बालकके मरणका सूतक माता पिता और भाइयोंके लिए दश दिन तकका और प्रत्यासन्न (निकटवर्ती) बांधवों के लिए एक दिनका है । तथा जो बंधु अप्रत्यासन्न हैं-निकटवर्ती नहीं हैं वे सिर्फ स्नान करें। चार पीढ़ी तकके वंधुओंको प्रत्यासन्न बंधु कहते हैं। मृत बालकको स्नान कराते समय, वस्त्र पहनाते समय, श्मशानको ले जाते समय और जलाते समय आसन्न बंधुही उसका स्पर्श करें, अप्रत्यासन्नबंधु स्पर्श न करें ।। ५६-५८ ॥ कृतचौलस्य बालस्य पितुर्धातुश्च पूर्ववत् । । आसन्नेतरबन्धूनां पञ्चाहेकाहमिष्यते ॥ ५९ ॥. चौल-संस्कार किये हुए बालकके मरणका सतक माता, पिता और भाइयोंको दश दिन तकका आसन्नबंधुओंको पांच दिन तकका और अनास्न्न बंधुओंको एक दिनका है ॥ ५९ ॥ मरणे चोपनीतस्य पित्रादीनां तु पूर्ववत् । आसन्नबांधवानां च तथैवाशीचमिष्यते ।। ६०॥ . पञ्चमानां तु पात्रं षष्ठानां तु चतुर्दिनम् । सप्तमानी त्रिरात्रं स्यात्तदूर्वं न (तु) प्लवं मतम् ॥ ६१ । उपनयनसंस्कार किये हुए बालकके मरणका सुतक माता, रिता और भाइयोंको दश दिनका है और चौथी पीढ़ी तकके आसन्न बांधवोंकोभी दश दिनका है, तथा पांचवीं पीढ़ीवालोंको छह दिनका, छठीवालोंको चार दिनका और सातवीं वालीको तीन दिनका है। तथा सातवीं पीढ़ीसे ऊपरके गोत्रज बांधव सिर्फ स्नान करें ॥ ६०-६१ ॥ जननाशौच । जननेऽप्येवमेवाघ मात्रादीनां तु मूतकम् । तदा नाघं पितुतु भिकर्तनतः पुरा ॥ ६२॥ पिता दद्यात्तदा स्वर्णताम्बूलवसनादिकम् । अशुचिनस्तु नैव स्युर्जनास्तत्र परिग्रहे ॥ ६३ तदात्व एव दानस्यानुपपत्तिर्भवेद्यदि। तदहः सर्वमप्यत्र दानयोग्यमिति स्मृतम् ॥ ६४ ।। जननाशौचमें भी माता आदिको.इसी तरहका सूतक है अर्थात् माता, पिता, भाई और आसन्न बंधुओंको दश दिनका, · पांचवीं पीढ़ीवालांचे छह दिनका, सातवीं वालोंको तीन दिनका है; परंतु बालक उत्पन्न होनेपर नाभिकर्तनसे पहले पहले पिता और भाईको सूतक नहीं है इसलिए उस समय बालकका पिता और भाई सोना, तांबूल, वस्त्र आदिका दान देवें । उस दानके लेनेवाले भी अशुधि-सूतकी नहीं होते । यदि बालक उत्पन्न होनेके अनन्तर ही पिताके लिए सूतक मान लिया जाय या उस दानके लेनेवालोंको अशुचि मान लिया जाय तो दान देनेकी रिवाज ही नहीं बनेगी। इसलिए बालकोत्पत्तिका वह सारा ही दिन दान देने योग्य है । ६२-६४ ॥ तदा पुम्भसवे मातुर्दशाहमनिरीक्षणम् ।। ' . अब विंशतिरात्रं स्याइनधिकारलक्षणम् ॥ ६५ ॥ . .
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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