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________________ www.indin wwwwwsha त्रैवर्णिकाचार ३६९ वृक्षमूले स्वपेन्नैव खट्वाशय्यासने दिने । मन्त्रपञ्चनमस्कार जिनस्मृति स्मरेद्हृदि ॥२०॥ अञ्जलावश्नीयात्पर्णपात्रे ताने च.पैत्तले । भुक्तं चेत्कांस्यजे.पात्रे तत्तु शुद्ध्यति वह्निना ॥ २१ ॥ . नियत समयमें ऋतुमती हुई स्त्री डाभके आसनपर सोये, निर्जन एकान्त स्थानमें रहे, किसी स्त्री-पुरुष आदिको न छूवे, मौन-युक्त रहे, देव-धर्मसंबंधी चर्चा न करे; मालती, माधवी, कुंद आदिकी बेल हाथमें रक्खे शीलकी पूरी पूरी रक्षा करे, तीन दिनतक एक बार भोजन करे, गोरसदूध, दही, घी न खावे; आंखोंमें अंजन ( काजल)न आंजे, शरीरमें तेल की मालिश और गंधलेपन न करे, पुष्पमाला न पहने, शंगार न करे, देवको गुरुको और राजाको न देखे, दर्पणमें अपना रूप न निरखे, कुल-देवताका दर्शन न करे; उनसे, भाषण भी न करे, वृक्षके नीचे न सोवे, पलंगपर न सोवे, दिनमें भी न सोने, पंचनमस्कारमंत्रका हृदयमें स्मरण करती रहे (मुखसे उच्चारण न करे), येलीमें या पत्तलमें या तांबे-पीतलकी थालीमें भोजन करे; कांसेकी, थालीमें भोजन न करे, यदि कर ले तो वह थाली अभिपर तपानेसे शुद्ध होती है ॥ १६-२१॥ रजस्वलाकी शुद्धि । चतुर्थे दिवसे स्नायात्मातर्गोसर्गतः पुरा । ... पूर्वाहे घटिकापट्कं गोसर्ग इति भापितः ॥ २१ ॥ । चौथे दिन प्रातःकाल ही गोससे पहले स्नान करे। प्रातःकालके छह घड़ी कालको गोसकाल कहते है अर्थात् सूर्योदयसे तीन घड़ी पहलेके और तीन घड़ी पीछेके कालको गोर्ग काल कहते हैं । यह समय गायोंको चरनेके लिए जंगलमें छोड़नेका है अतः इसे गोसर्ग-काल कहते शुद्धा भर्तुश्चतुर्थेऽहि भोजने रन्धनेऽपि वा। . देवपूजागुरूपास्तिहोगसेवासु पञ्चमे ॥ २३ ॥ वह रजस्वला स्त्री चौथे दिन स्नान करलेनेपर भोजन-पान बनाने योग्य शुद्ध हो जाती है, पर देवपूजा, गुरकी उपासना और होम-सेवाके योग्य पांचवे दिन होती है ॥ २३ ॥ उदक्ये यदि सलापं कुर्वाते उभयोस्तयोः । . . . अतिमात्रमघं तस्मादज्य सम्भापणादिकम् ॥ २४॥ .. - दो रजस्वका स्नियां यदि परस्परमें बातचीत करें तो भारी पाप लगता है। इसलिए रजस्वलाएं परस्पर नातचीत न करें ॥ २४॥ संलापे तु तयोः शुद्धिं कुर्यादेकोपवासतः। तवयात्सहसंवासे तत्रयात्पंक्तिभोजने ॥२५॥ अगर दो रजस्वला स्त्रियां मिलकर परस्पर बातचीत करें तो उसका प्रायश्रित एक एक उपवास है-एक एक उपवास करनेसे वे उस पापसे उन्मुक्त होती हैं। मंदि दोनों एक साथ रहें ३७
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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