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________________ MARARMAnnar त्रैवर्णिकाचार : नामका अन्तराप है। यदि किसीके द्वारा कोई तरहका उपसर्ग हो जाय तो उपसर्ग नामका अन्तराय है। यदि मुनिके पैरोंके बीचमें होकर कोई पंचेन्द्रिय जीव निकल जाय तो पंचेन्द्रियगमन नामका अन्तराय है। यदि परोसनेवालेके हाथसे छुटकर वर्तन नीचे गिर पड़े तो भाजमसम्पात नामका अन्तराय है । तथा--|| ५९ ॥ उच्चार पस्सवणं अभोजगिहपवेसणं तहा पडणं । . उववेसणं सदंसो भूमीसंफास णिवणं ॥ ६० ॥ यदि अपनेको टट्टीकी या मूत्रफी बाधा हो जाय तो उच्चार और प्रस्रवण नामके अन्तराय हैं। यदि आहारफे लिए. पर्यटन करते समय मुनिका चंडाल आदिके घरमें प्रवेश हो जाय तो अभोजनहप्रवेश नामका अन्तराय है। यदि मूछों आदिके कारण मुनि गिर पड़े तो पतन नामको अन्तराय है। यदि भोजन करते समय चैठ जाय तो उपवेशन नामका अन्तराय है। यदि चर्या के समय इत्ता आदि जानवर अपनेको काट खाय तो सदंश नामका अन्तराय है । भोजनके समय सिद्धभक्ति कर चुकनेपर हायसे भूमिका स्पर्श हो जाय तो भूमिस्पर्श नामका अन्तराय है । खकार आदि । थकना निष्ठीवन नामका अन्तराय है । तथा-॥ ६०॥ उदरकिमिणिग्गमणं अदत्तगहणं पहार गामदाहो य । पादेण किंचिगहणं करण किंचि वा भूमीदो ॥ ६१ ॥. . . उदरसे यदि कृमि निकल आवे तो कृमिनिर्गमन नामका अन्तराय है। यदि विना दिया हुआ प्रहण करले तो अदत्तग्रहण नामका अन्तराय है। अपने या परके ऊपर तलवार आदिका प्रहार हो तो महार नामका अन्तराय है । यदि माम जल रहा हो तो ग्रामदाह नामका अन्तराय है। पैरसे किसी चीजका उठाना पाद नामका अन्तराय है और हायसे भूमिपरसे कुछ उठाना इस्त. नामका अन्तराय है । ये अपर कहे हुए भोजनके बत्तीस अन्तराय हैं ।। ६१ ॥ चौवह मल। णहरोमजंतुअस्थिकणकुंडयपूयगहिरमंसचम्माणि । - वीयफलकंदमूला छिण्णमला चोदसा होति ॥१२॥ नम्ब, रोम, जन्तु (प्राणिरहित शरीर), हड्डी, तुष, कुण्ड (चावल ) आदिका भीतरी सूक्ष्म अवयव, पीप, चर्म, रुधिर, मांस, वीज, फल, कंद और मूल-ये आठ प्रकारको पिंडशुद्धिसे जुड़ चौदह मल है ॥६॥ इत्येवं मिलित्वा सर्वे पट्चत्वारिंशदात्मकाः ।। __ अन्तराया मुने रम्याः सर्वजीवदयावहाः ॥ ६३ ॥ इस तरह.बत्तीस और चौदह मिलाकर कुल छयालीस मुनिके भोजनके अन्तराय हैं.. जो मुनिको सम्पूर्ण जीवापर दयाभाव करानेवाले हैं ।। ६३ ॥ अन्तराया मता येषां न सन्ति तपस्विनः। . जेया भ्रष्टा दयातीताः श्वभ्रावासनिवासिनः ।। ६४ ॥ जो मुनि इन अन्तरायोंको नहीं पालते वे भ्रष्ट मुनि हैं, करुणाभावसे रहित हैं और नरकगामी हैं ॥४॥
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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