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________________ (२८) १३७ पृष्ठ सं० पंक्ति सं० अशुद्धियां । स्थापनाकी थी १३७ २५ की थी १४२ भद्रासन बैठे अण्ये-पान १९७ भी दूषित है १९७ २७ कायसे अन्न २०० अग्निसे पकाये २०५ धर्मे २२१ भूखे रहने दे २२३ बात भी न करे शुद्धियां। स्थापना की जाती है की जाती है भद्रासन पर बैठे अपेय-पान भी रात्रिम दूषित कायसे रात्रिमें अन्न अमिसे न पकाये चैत्य १९५ चैत पत्य २०८ OM २२६ २३२ २३२ भूखे न रहने दे बात भी न करे अर्थात् इनके साथ लेन-देन व्योहार न करे न्यायमार्गे . पहलेके ब्रह्मभागोंको छोड़ आगे ब्रह्ममागोंकी पूर्व दिशावाले मनुष्यभाग और देवभागोंमें न्यायमाग ब्रह्मस्थानको छोड़ किसी दूसरे स्थानमें १६ चतुर्थे २६ २ १२ १ २३२ २३३ २५२ २५३ २५३ २५७ २६५ २७४ २७६ चतुथ अग्निमंडलापर दाहिनी ओरके चूलाकम भेऽन्हि जमादि दाहिने पैरको मृत्योच्च घरपर अथवा शूद्रके घर पर रात्रि भोजन भता याग्य अर्घ्य चढ़ावे मधुपक कन्याका मामा वरको हाथ पकड़कर वेदीके पास लावे उन मंडलोपर वाई ओरके चूलाकर्म शुभेऽह्नि जयादि बायें पैरको मृत्योश्च घरपर अथवा रात्रिमें अथवा शूद्रके घरपर भोजन १६ -२८६ भत्ती ३२० ३२१ १७ ३२२८ ३२१ योग्य उसके हाथमें अर्घ्य दे मधुपर्क घरके दरवाजेपर वरके आजानेपर कन्याका मामा उसका हाथ पकड़कर घरके भीतर ले जाय।
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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