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________________ २३६ . Mundaram त्रैवर्णिकाचार। वेदिकाग्रे जिनागारे काष्ठनिर्मितपीठयोः । दम्पती तौ च संस्कृत्य भूषणैरुपवेशयेत् ॥ ५६ ॥ अग्रे स्वस्तिकमालेख्यं चन्दनस्तण्डुलैः पुरः । पूर्ववत्कलशं रम्यं स्थापयेन्मन्त्रपूर्वकम् ॥ ५७ ।। जिनेन्द्रसिद्धसूरी श्च पूजयेद्भक्तितः परान् । बहुधा धूपदीपैश्च पक्कानः सत्फलैरपि ॥ ५८ ॥ यक्षीयक्षादिदेवानां पूर्णाहुतिमतः परम् । आचार्यः स्वकरे धृत्वा कल्याणकलशं वरम् ॥ ५९॥ पुण्याहवाचनैरम्यैगर्भिणी तां प्रसिञ्चयेत् । शान्तिभक्तिं ततश्चोक्त्वा देवान् सर्वान् विसर्जयेत् ॥६०॥ पहिले उन दोनों पति-पत्नियोंको जेवर आदिसे भूषित कर जिन मन्दिरमें वेदीके सामने लकड़ीके पाटोंपर बैठावे । उनके सामने गन्ध और चाँवलोंका सांथिया बनावे । उसके ऊपर मंत्रका उच्चारण कर पहलेकी तरह एक सुन्दर कलश घरे । फिर अर्हन्त, सिद्ध, आचार्योंकी बड़ी भक्ति-भावसे नाना प्रकारके दीप, धूप, नैवेद्य, फल आदि अष्टद्रव्योंसे पूजा करे । बाद यक्षी यक्ष आदि देवतोंको पूर्णाहुति देवे । पश्चात् गृहस्थाचार्य उस कल्याणकारी कलशको हाथमें लेकर पुण्याहवचनों द्वारा उस गर्भिणीका. अभिषेक करे-उसपर जलधारा छोड़े। तदनन्तर शान्तिपाठ पढ़कर सब देवोंका विसर्जन करे ॥५६-६०॥ ततो गन्धोदकै रम्यैर्गर्भिणी स्वोदरं स्पृशेत् । कलिकुण्डादि सद्यन्त्र रक्षार्थ बन्धयेद्गले ॥६१॥ सौभाग्यवत्यः सन्नायश्चानादिना प्रतोषयेत् । . सुप्रमोदश्च सर्वेषां जातीनां समुत्पादयेत् ॥ ६२ ॥ . पश्चात् वह गर्भिणी स्त्री गन्धोदक लेकर अपने उदरपर लगावे और अपने गलेमें गर्भ-रक्षाके अर्थ कलिकुंड आदि यंत्र बांधे। फिर घरका मालिक सौभाग्यवती उत्तम स्त्रियोंको भोजन, कपड़े आदिसे सन्तुष्ट करे और अपने सम्पूर्ण जातिके लोगोंमें हर्ष उत्पन्न करे ॥ ६१-६२ ॥ मंत्र-ॐ कंठं व्हःप: असि आउ सा गोभकं प्रमोदेन परिरक्षत स्वाहा । इति होमान्ते गन्धोदकेन प्रसिञ्च्य स्वपत्न्युदरं स्वयं स्पृशेगा। अर्थात्-होम हो चुकनेके बाद यह मंत्र पढ़कर गन्धोदक सिंचन कर पति अपनी उस गर्भिणी स्त्रीके उदरका स्पर्शन करे । पुंसवन किया। : सद्गर्भस्याथ पुष्टयर्थं क्रियां पुंसवनाभिधाम् । कुर्वन्तुं पञ्चमे मासि पुमांसः क्षेममिच्छवः ।। ६३ ।।
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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