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________________ trafarara | २३७ मंत्रा भाव यह है कि मेरे शरीरका अधिष्ठाता देव मुझे बल प्रदान करे । इससे मालूम पड़ता है कि स्त्री-पुरुषोंके शरीर व सम्पूर्ण अंग उपांगांके अधिष्ठाता देव होते हैं। स्त्रीसमागमके समय पढ़ने योग्य मंत्री भी यही मालूम पड़ता है । ये मंत्र ग्रंथकर्त्ताके जन्म से पहलेके लिखे हुए अन्य ग्रन्थोंमें भी पाये जाते हैं । ऋषिप्रणीत आगमसे भी निश्चित है कि हुएक स्त्री पुरुषके शरीर आदि अंगके अधिष्ठाता देव हुआ करते हैं। ये देव प्रायः व्यन्तर जाति हैं । इनका हर तरहका स्वभाव होता है । अपने २ कर्मोदयसे ये भिन्न २ स्वभाव वाले होते हैं। कितने ही लोग ऐसी बातोंके सम्बन्धमें एक भारी तमूल उत्पन्न कर देते हैं । कई स्थानोंमें बतलाया गया है कि अच्छेसे अच्छे और बुरेसे बुरे स्थानोंमें रहनेका उनका स्वभाव है। अच्छीसे अच्छी और बुरीसे बुरी चीजोंसे प्रेम करना भी उनके लिये स्वभाविक है । लेकिन सबका एकसा स्वभाव नहीं होता है। किसीका कैसा ही है तो किसीका कैसा ही । जैसे किन्हीं देवांका नियोग है कि वे सूर्य-चंद्रमा के विमानोंके वाहन बन कर उनको खींचते हैं। उन देवोंको उनके कर्मों का फल उसी प्रकारसे प्राप्त होता है । इसी प्रकार व्यन्तर आदि देवांका नियोग है कि कोई स्त्री पुरुषोंके शरी आदि अंगो में निवास करते हैं; और कोई कहीं अन्यत्र निवास करते हैं । सारे मध्यलोक में सब जगह उनका निवास हैं । उनके अनेक प्रकारके नियोग हैं। ये मनुष्योंके कमदयके अनुसार उनके सहायक भी होते हैं । यदि कोई यह शंका उठावे कि जब वे मनुष्योंके सहायक हैं तो हर समय उनकी सहायतामें उन्हें तत्पर रहना चाहिए और कभी किसीका अनिष्ट नहीं होना चाहिए। इसका उत्तर यह है कि इष्ट अनिष्टकी प्राप्ति अपने अपने पहले किये हुए कम के अनुसार होती है। उसमें अनेक बाह्य कारण भी अवलंबन होते हैं। उनकी कोई गिनती नहीं है । अतः संभव है कि वे मनुष्योंके खास खास कायोंमें सहायक होते हीं ॥ ४४-४५ ॥ सन्तुष्ट भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च । यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥ ४६ ॥ इच्छापूर्वं भवेद्यावदुभयोः कामयुक्तयोः । रेतः सिञ्चेत्ततो योन्यां तस्माद्गर्भ विभर्ति सा ॥ ४७ ॥ जिस स्त्रीसे पुरुष और जिस पुरुपसे स्त्री सन्तुष्ट होती है उसके कुलमें निरन्तर कल्याण की वृद्धि होती रहती है। कामयुक्त स्त्री और पुरुष दोनोंके वीर्यका जब एक साथ क्षरण होता है तब उससे वह स्त्री गर्भ धारण करती है ।। ४६-४७ ॥ ऋतुकालोपगामी तु मानोति परमां गतिम् । सत्कुलः प्रभवेत्पुत्रः पितॄणां स्वर्गदो मतः ॥ ४८ ॥ इस तरह जो पुरुष ऋतु- समय में स्त्रीसंगम करता है वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है; और उसके उत्तम कुलीन तथा अपने मातापिताओंको स्वर्ग प्राप्त करा देनेवाला पुत्र होता है ॥ ४८ ॥ ऋतुस्नातां तु यो भार्थी सन्निधौ नोपयच्छति । . घोरायां भ्रूणहत्यायां पितृभिः सह मज्जति ॥ ४९ ॥
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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