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________________ त्रैवर्णिकाचार। .१८१ तीर्थान्ते जिनशीतलस्य सुतरामाविश्वकार स्वयं लुब्धो वस्तुषु भूतिशर्मतनयोऽसौ मुण्डशालायनः ।। १.२३ ॥ कन्या, हाथी, सोना, घोडा, गाय, दासी, तिल, स्थ, भूमि और मकान ये दरिद्रोंको इष्ट दशप्रकारके दान हैं । जिनका दशवें शीतल नाथ तीर्थकरके तीर्थके अन्त समयमें तरह तरहकी वस्तुओंमें लोलुप हुए भूतिशर्माके पुत्र मुंडशालायनने स्वयं आविष्कार किया था। मावार्थये दान वीतरागकथित नहीं हैं इनका प्रवर्तक एक स्वार्थी लुब्धक पुरुष है । इस लिए ये दान निन्य हैं। यदि ये ही दान आगे लिखे अभिप्रायोंसे किये जाय तो न निन्यही हैं और न पापके कारणही हैं ।। १२३ ॥ विचार्य युक्तितो देयं दानं क्षेत्रादि सम्भवम् । योग्यायोग्यं सुपात्राय जघन्याय महात्मभिः ॥१२४ ।। श्रावकोको योग्य-अयोग्यका युक्तिपूर्वक विचार कर जघन्य पात्रके लिए भूमि आदि दश दान अवश्य देने चाहिएं ॥ १२४ ॥ औरों को क्यों न दे ऐसी शंका होने पर कहते हैं मध्यमोत्तमयोलोंके पात्रयोर्न प्रयोजनम्। । क्षेत्रादिना ततस्ताभ्यां देयं पूर्वं चतुर्विधम् ॥ १२५ ।। मध्यम पात्रों और उत्तम पात्रोंको लोकसे कुछ प्रयोजन नहीं है । इस लिए उनको इन दशदानांके अतिरिक्त पूर्वोक्त चार प्रकारके आहार दान, औषध दान, शास्त्र दान और अभय दान देवे ॥ १२५ ॥ चैत्यालयं जिनेंद्रस्य निर्माप्य प्रतिमां तथा । प्रतिष्ठां कारयेद्धीमान हैमैः संघ तु तर्पयेत् ॥ १२६ ॥ पूजायै तस्य सत्क्षेत्रग्रामादिकं प्रदीयते । अभिषेकाय गोदानं कीर्तितं मुनिभिस्तथा ॥ १२७ ॥ जिन भगवानका चैत्यालय बनवाकर तथा प्रतिमा बनवाकर उनकी प्रतिष्ठा करावे और सुवर्णसे सारे जैन संघको तृप्त करे । जिन भगवानकी पूजाके लिए अच्छी उपजाऊ जमीन, ग्राम, घर आदि देवे जिससे कि उनकी उपजसे निर्विन जिन पूजाका कार्य चलता रहे । तथा भगवानके अभिषेकके लिए गौका दान दे जिसके शुद्ध प्रासुक दूधसे भगवानका दुग्धाभिषेक हुआ करे । ऐसा आचार्योका मत है ।। १२६ ॥ १२७ ॥ शुद्धश्रावकपुत्राय धार्मिष्ठाय दरिद्रिणे । . कन्यादानं प्रदातव्यं धर्मसंस्थितिहेतवे ।। १२८ ।।
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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