________________
त्रैवर्णिकाचार |
1
ब्रह्मसरिसुविप्रेण यदुक्तं जिनधर्मिणाम् प्रोक्तं महापुराणे वा तदेवात्र प्रकाशितम् ॥ २१९ ॥
१२३
श्रीब्रह्मसूरिने जिनधर्मियोंके लिए जो क्रियाकांड कहा है अथवा महापुराणमें जो कहा गया है वही इस त्रैवर्णिका चार शास्त्रमें कहा गया है ॥ २१५ ॥
sa श्रीधर्मरसिकशास्त्रे त्रिवर्णाचारकथने भट्टारकश्रीसोमसेनविरचिते गृहकर्मदेवतापूजानिरूपणीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ॥