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________________ त्रैवार्णकाचार। ..... प्राणायाममन्त्रं त्रिरुचार्य-" मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तार - कर्मभूभृताम् । ज्ञातारं विश्वतत्त्वानांवन्दे तद्गुणलब्धये॥" " सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः" । इति वाचनां .. गृहीत्वा दर्भोदकेन ऋषीणां तर्पणं कुर्यात् । तद्यथा संध्यावंदन हो चुकनेके बाद पर्यकासन बैठकर दाहिनी जाँघकी टखनीपर दोनों हाथोंको मुकुलित कर रक्खे । उसमें बायें हाथको नीचे और दाहिने हाथको ऊपर रक्खे। दोनों हाथोंमें दूव ले । पश्चात् प्राणायामके मंत्रोंका तीन बार उच्चारण कर “ मोक्षमार्गस्य नेतारं " इत्यादि श्लोक और “ सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः” इत्यादि सूत्र पढ़कर दर्भके अग्रमागमें जल लेकर उससे ऋषियोंका तर्पण करे । वह इस तरह करे ॐ हीं अर्हत्परमेष्ठिनस्तर्पयामि । ॐ हीं सिद्धपरमेष्ठिनस्तर्पयामि । ॐ हीं आचार्यपरमेष्ठिनस्तर्पयामि । ॐ हीं उपाध्यायपरमेष्ठिनस्तपयामि । ॐ ही सर्वसाधुपरमेष्ठिनस्तर्पयामि । ॐ हीं जिनॉस्तर्पयामि । ॐ हीं अवधिजिनांस्तर्पयामि । ॐ ही परमावधिजिनांस्तर्पयामि । ॐ ही सर्वावधिजिनांस्तर्पयामि । ॐ हीं अनन्तावधिजिनांस्तर्पयामि । एवं । ॐ ही कोष्ठबुद्धीस्तर्पयामि । ॐ हीं वीजबुद्धीस्तर्पयामि । ॐ हीं पादानुसारिणस्तर्पयामि । ॐ ही सम्भिन्नश्रोतृस्तर्पयामि । ॐ हीं प्रत्येकबुद्धांस्तर्पयामि । ॐ ही स्वयम्बुद्धास्तर्पयामि । ॐ ही बोधितबुद्धास्तर्पयामि । ॐ हीं ऋजुमतींस्तर्पयामि । ॐ ही विपुलमतीस्तर्पयामि । ॐ ही दशपूर्विणस्तर्पयामि । ॐ ही चतुर्दशपूर्विणस्तर्पयामि । ॐ ही अष्टाङ्गमहानिमित्तकुशलास्तर्पयामि । ॐ ही विक्रियद्धिप्राप्तांस्तर्पयामि । ॐ हीं विद्याधरांस्तर्पयामि । ॐ ही चारणांस्तर्पयामि । ॐ ही प्रज्ञाश्रवणांस्तर्पयामि । ॐ ही आकाशगामिनस्तर्पयामि । ॐ हीं आस्यविषास्तर्पयामि । ॐ ही दृष्टिविपांस्तर्प.यामि । ॐ ही उग्रतपस्विनस्तर्पयामि । ॐ ही दीप्ततप
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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