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________________ रामचन्द्र श्रीमद् राजचन्द्र करोचली पड़ी दाढी डाचां तणो दाट वळयो, काळी केशपटी विषे श्वेतता छवाई गई: सूंघ, सांभळवं, ने देखq ते माडी वाळयं, तेम दांत आवली ते, खरी के खवाई गई। वळी केड वांकी, हाड गयां, अंगरग गयो, ऊठवानी आय जतां लाकडी लेवाई गई; अरे ! राजचंद्र एम, युवानी हराई पण, मनथी न तोय रांड ममता मराई गई ॥२॥ करोडोना करजना शिर पर डंका वागे, रोगथी रूंधाई गयु, शरीर सुकाईने; पुरपति पण माथे, पीडवाने ताकी रह्यो, पेट तणी बेठ पण, शके न पुराईने । पितृ अने परणी ते, मचावे अनेक धंध, पुत्र, पुत्री भाखे खाउँ खाउं दुःखदाईने, अरे | राजचंद्र तोय जीव झावा दावा करे, जंजाळ छडाय नहीं, तजी तृषनाईने ॥३॥ . थई क्षीण नाडी अवाचक जेवो रह्यो पडी, जीवन दीपक पाम्यो केवळ झखाईने; छेल्ली ईसे पड्यो भाळी भाईए त्यां एम भाख्यं; हवे टाढी माटी थाय तो तो ठीक भाईने । हाथने हलावी त्यां तो खोजी बुढ्ढे सूचव्यु ए, बोल्या विना बेस बाळ तारो चतुराईने ! अरे ! राजचंद्र देखो देखो आशापाश केवो ? जतां गई नही डोशे ममता मराईने ॥४॥ ___ मुंहपर झुर्रियां पड गई, गाल पिचक गये, काली केशपट्टियाँ सफेद हो गई, सूंघने, सुनने और देखनेकी शक्ति जाती रही, दाँत गिर गये या सड गये, कमर टेढी हो गई, हड्डियाँ कमजोर हो गई, शरीरकी शोभा जाती रही, उठने-बैठनेकी शक्ति जाती रही, और चलने-फिरने में लकडी लेनी पडी। राजचन्द्र कहते हैं कि यह आश्चर्य है कि इस तरह जवानी तो चली गई, परन्तु फिर भी मनसे यह राड ममता नही मरी ।।२॥ करोडोके कर्जका सिरपर डका बज रहा है शरीर सूखकर रोगोका घर हो गया है, राजा भी पीडा देनेके लिये मौका ताक रहा है और पेट भी पूरी तरहसे भरा नही जा सकता, माता-पिता और स्त्री अनेक उपद्रव मचाते है, पुत्र-पुत्री दु खदायीको खानेको दौडते हैं। राजचन्द्र कहते हैं कि यह आश्चर्य है कि तो भी यह जीव मिथ्या प्रयत्न करता रहता है परन्तु इससे तृष्णाको छोडकर जजाल नही छोडा जाता ॥३॥ . नाडी क्षीण हो गई है, अवाचकको भांति पड़ा हुआ है, जीवनका दीया वुझनेको है, इस अन्तिम अवस्थामें पड़ा देखकर भाईने यो कहा कि अव मिट्टी ठडी हो जाय तो ठोक है। इतनेमें उस वुड्ढेने खीजकर हाथको हिलाकर ईशारेसे कहा--"अरे मूर्ख । चुप रह, अपनी चतुराईको चूल्हेमें डाल ।" राजचन्द्र कहते हैं कि यह आश्चर्य है कि देखिये, देखिये आशापाश कैसा है । मरते-मरते भी बुड्ढेकी ममता नही मरी ॥४॥
SR No.010840
Book TitleShrimad Rajchandra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Jain
PublisherShrimad Rajchandra Ashram
Publication Year1991
Total Pages1068
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Rajchandra
File Size49 MB
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