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________________ ज्ञानके परदे १०१ समूचे भूगोलकमे अब कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जो उसके आकर्षण और आदेशके बाहर रह सके। वह राजकुमार ही तबसे इस भूमण्डलका प्रकट-परोक्ष शासक है और उसकी अखण्ड बाह्यसत्ताके परिधानमे सौन्दर्यका और सौन्दर्यके भी अन्तरालमें बोधका ही निवास है। कहते है कि तभीसे ज्ञानका सौन्दर्य के रूपमें और सौन्दर्यका शक्तिके रूपमें प्रकट होना अनिवार्य हो गया है।
SR No.010816
Book TitleMere Katha Guru ka Kahna Hai Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavi
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1991
Total Pages179
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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