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________________ ७१८ भीमद् राजचन्द्र [७५३ म्यास्यानसार बाली तो कषाय ही है, और उस कषायमें भी अनंतानुबंधी कषायके चार योद्धा तो बहुत ही मार डाल. नेवाले हैं । इन चार योद्धाओंके बीचमें क्रोधका स्वभाव दूसरे अन्य तीनकी अपेक्षा कुछ जल्दी मालूम हो जाता है। क्योंकि उसका स्वरूप सबकी अपेक्षा जल्दी ही मालूम हो सकता है । इस तरह जब किसीका स्वरूप जल्दी मालूम हो जाय, तो उस समय उसकी साथ लड़ाई करनेमें, क्रोधीकी प्रतीति हो जानेसे, लबनेकी हिम्मत होती है। २०१. घनघाती चार कर्म-मोहनीय, झानावरणीय, दर्शनावरणीय और अंतराय-जो आत्माके गुणोंको आवरण करनेवाले हैं, उनका एक तरह क्षय करना सरल भी है । तथा वेदनीय बादि कर्म यपि धनघाती नहीं है, तो भी उनका एक तरहसे क्षय करना दुष्कर है । वह इस तरह कि जब वेदनीय कर्मका उदय आवे तो उसका क्षय करनेके लिये उसे भोगना ही चाहिये। उसे न भोगनेकी इच्छा हो तो भी वह इच्छा निरुपयोगी ही है क्योंकि उसे तो भोगना ही चाहिये और यदि ज्ञानावरणीयका उदय हो तो वह प्रयत्न करनेसे क्षय हो जाता है। उदाहरणके लिये, कोई श्लोक यदि ज्ञानावरणीयके उदयसे याद न रहता हो तो उसे दोबार, चारबार, आठबार, सोलहबार, बत्तीसबार, चौंसठबार, सौबार, अर्थात् उसे अधिकबार याद करनेसे ज्ञानावरणीयका क्षयोपशम अथवा क्षय होकर वह श्लोक याद रहता है; अर्थात् बलवान होनेके कारण ज्ञानावरणीयका उसी भवमें अमुक अंशमें क्षय किया जा सकता है । यही बात दर्शनवरणीय कर्मके संबंधमें भी समझनी चाहिये । महाबलवान मोहनीय कर्म भी इसी तरह शिथिल होता है-उसका तुरत ही क्षय किया जा सकता है। जैसे उसका आगमन-प्रवाह-आनेमें जबर्दस्त है, उसी तरह वह जल्दीसे दूर भी हो सकता है । मोहनीय कर्मका तीव्र बंध होता है, तो भी वह प्रदेशबंध न होनेसे उसका तुरत ही क्षय किया जा सकता है । तथा नाम आयु आदि कर्मका जो प्रदेशबंध होता है, वह केवलज्ञान उत्पन्न होनेके पश्चात् अन्ततक भोगना पड़ता है; जब कि मोहनीय आदि चार कर्म उसके पहिले ही क्षय हो जाते हैं। - . २०२. उन्मत्तता यह चारित्रमोहनीयकी विशेष पर्याय है। वह कचित् हास्य, कचित् शोक, कचित् रति, कचित् अरति, कचित् भय, और कचित् जुगुप्सारूपसे मालूम होती है । कुछ अंशसे उसका ज्ञानावरणीयमें भी समावेश होता है । स्वममें विशेषरूपसे ज्ञानावरणीय-पर्याय ही मालूम होती है । २०३. 'संहा' यह ज्ञानका भाग है। परन्तु परिग्रहसंज्ञा लोभप्रकृतिमें गर्मित होती है। आहारसंज्ञा वेदनीयमें गर्मित होती है, और भयसंज्ञा भयप्रकृतिमें गर्मित होती है। २०४. अनंत प्रकारके कर्म मुख्य आठ प्रकारसे प्रकृतिके नामसे कह जाते हैं। वह इस तरह कि अमुक अमुक प्रकृति, अमुक अमुक गुणस्थानकतक होती है । इस तरह माप तोलकर ज्ञानीदेवने दूसरोंके समझानेके लिये स्थूलरूपसे उसका विवेचन किया है । उसमें दूसरे कितने ही तरहके कर्म अर्थात् 'कर्मप्रकृति'का समावेश होता है, अर्थात् जिस प्रकृतिके नाम कर्मग्रंथमें नहीं आते, वह प्रकृति उपर बताई हुई प्रकृतिकी ही. विशेष पर्याय है, अथवा वह ऊपर बताई हुई प्रकृतिमें गर्मित हो जाती है। - २०५. विभावका अर्थ विरुद्धभाव नहीं, किन्तु उसका अर्थ विशेषभाव होता है । आत्मा जो बारमारपसे परिणमन करती है वह भाव अथवा स्वभाव है। तथा जब बात्मा और बड़का संयोग
SR No.010763
Book TitleShrimad Rajchandra Vachnamrut in Hindi
Original Sutra AuthorShrimad Rajchandra
Author
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1938
Total Pages974
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, N000, & N001
File Size86 MB
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