SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 238
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्री गज सुकमाल महानुनि चौपई १७५ सुर निज वाणी साच करण भरगी रे । तिण ठाँमइ श्रावइ ततकाल रे । २॥सा० इम अनुकम वालक निरजीवते रे । प्राणी आणी मूकइ पास रे। पिण तू भेद न जाणड देवकी रे। देव सगति तिहां किसी विमासि रे ||शास० तुझ अगज रस मित हरि सारिखा रे । सुनसा पासइ मू कइ तेह रे। निज सुर* तरूनी परि पालइ सदा रे । तिल भरि ओछउ नही सनेह ।। |सं० तिण ए सवि x अ गज सुलसा तणारे । नदन तुझ जाणे निरधार रे । नयण जगावड नेह तिरगइ घणउ रे । अधिकउ मोह करम अधिकार रे॥॥स० श्री नेमीसर वचन इसा सुरगी रे। उलसइ (तिरण) निज अग अपार रे । पान्हा हु ती प्रगटइ परतणी रे । तिण अवसरि बत्रीसे धार रे ॥६॥स० लोचन विकसक कचुक उकसइ रे । वलियाँ माहि न मावइ बांह रे। हरखइ रोमचित काया थई रे। दूरि टल्यउ सगलउ दुख दाह रे ॥७॥स० जाण्यां पाखइ पिणजउ प्रति घणउ रे । तिण अवसरि तसु हु तउ नेह रे । प्रचरिज स्यउ थायइ जाण्या पछइ+ रे । अधिकउ दूर टल्यउ सदेह रे ॥८॥स० अनमिष लोचन ते सुत-- देखि- इ रे । जाण्यउ सफल जनम मुझ माज रे । *सुतनी xनवि प्र गज +पाखइ ~तसु
SR No.010756
Book TitleJinrajsuri Krut Kusumanjali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAgarchand Nahta
PublisherSadul Rajasthani Research Institute Bikaner
Publication Year1961
Total Pages335
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy