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________________ णमो सिद्धाणं । . तृतीय प्रकाश अरिहन्त हुए बिना सिद्ध नहीं बना जा सकता, सिद्ध होने के लिए सबसे पहले अरिहन्त की भूमिका पार करनी ही होती है। अरिहन्त पद सादि-सान्त है और सिद्ध पद सादिअनन्त-पंचम गति प्राप्त करने वाले अरिहन्त भगवान ही होते हैं । संसारी जीब चार गतियों में आवागमन करते रहते हैं । संसार-चक्र का ऐसा नियम है कि जहां से जीव जाता है, कालान्तर में वह पुन: वहीं पहुंच जाता है जहां से वह चला था, किन्तु पंचम गति का यह नियम नहीं है । उस अवस्था को प्राप्त कर जीव पुन: चार गतियों में नहीं आता है। उसी अनिवृत्ति-प्रधान गति का नाम सिद्ध गति है । वह गति सदा काल से चली आ रही है और वह सात विशेषणों से मंडित है, जैसे कि शिव, अचल, आरोग्य, अनन्त अक्षय, अन्याबाध और अपुनरावृत्ति । इनकी संक्षिप्त ध्याख्या इस प्रकार है:
SR No.010732
Book TitleNamaskar Mantra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchandra Shraman
PublisherAtmaram Jain Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages200
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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