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________________ 73 इसलिए तो ( दोनो) कुशीलो ( मानसिक तनाव उत्पन्न करनेवाले कर्मों) के साथ बिल्कुल राग मत करो और (उनके साथ) सम्पर्क ( भी ) मत ( रक्खो), क्योकि (आत्मा का) स्वतन्त्र (स्वभाव) कुशीलो के साथ सम्पर्क और (उनके साथ) राग से व्यर्थ ( हो जाता है) । 74 75 76 77 जैसे कोई व्यक्ति निन्दित आचरणवाले मनुष्य को जानकर उसके साथ ससर्ग को और राग करने को छोड देता है, वैसा ही (पुद्गल ) - कर्म का स्वभाव ( समझा गया है) । उसकी निन्दित व्यवहार - प्रकृति को निश्चय ही जानकर स्वभाव मे लीन (व्यक्ति) उसके साथ को छोड देते हैं और उसके साथ) (राग -क्रिया को ) (भी) तज देते हैं । आसक्त (जीव ) कर्मों को बाँधता है, अनासक्ति से युक्त जीव (कर्मो को छोड देता है । यह जिन - उपदेश है । इसलिए कर्मों मे श्रासक्त मत होवो । जो शुद्ध श्रात्मा (है), (वह) निश्चय ही वास्तविकता है । (ऐसी) (आत्मा) (ही) पूर्ण रागद्वेषरहित, मुनि और ज्ञानी ( कही जाती है) । उस वास्तविकता मे ठहरे हुए मुनि (ज्ञानी) परम शान्ति प्राप्त करते हैं । उस 78. जो (व्यक्ति) शुद्ध श्रात्मा पर (तो) निर्भर नही है, किन्तु ( वह) (बाह्य) तप और व्रत धारण करता है । ( धारण करने को) केवलज्ञानी अबोध तप और अबोध व्रत कहते हैं । चयनिका [27
SR No.010711
Book TitleSamaysara Chayanika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani
PublisherPrakrit Bharti Academy
Publication Year1988
Total Pages145
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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