SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 183
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मुनि-जीवन और आपत्काल | ९५ जैन मार्ग (धर्म) इस कलिकालमें सब ओर से भद्ररूप हुआ, वे गणनायक आचार्य समंतभद्र पुनः पुनः वंदना किये जानेके योग्य हैं । इस परिचय में, यद्यपि, 'शिवकोटि ' राजाका कोई नाम नहीं है; परंतु जिन घटनाओं का इसमें उल्लेख है वे ' राजावलिकथे' आदिके अनुसार शिवकोटि राजाके 'शिवालय' से ही सम्बन्ध रखती हैं । 'सेनगणकी पट्टावली' से भी इस विषयका समर्थन होता । उसमें भी ' भीमलिंग 'शिवालय में शिवकोटि राजाके समंतभद्रद्वारा चमत्कृत और दीक्षित होने का उल्लेख मिलता है । साथ ही उसे ' नवतिलिंग ' देशका 'महाराज' सूचित किया है, जिसकी राजधानी उस समय संभवत: ' कांची ' ही होगी । यथा " ( स्वस्ति) नवतिलिङ्गदेशाभिरामद्राक्षाभिरामभीमलिङ्गस्वेन्वादिस्तोकोत्कीरण (?) रुद्र सान्द्रचन्द्रिका विशदयशः श्रीचन्द्रजिनेन्द्र सद्दर्शनसमुत्पन्न कौतूहलकलितशिवको टिमहाराजतपोराज्यस्थापकाचार्य श्रीमत्समन्तभद्रस्वामिनाम् * " इसके सिवाय, 'विक्रान्तकौरव' नाटक और श्रवणबेलगोलके शिलालेख नं० १०५ ( नया नं० २५४ ) से यह भी पता चलता है कि ' शिवकोटि ' समं भद्र के प्रधान शिष्य थे । यथा-शिष्य तदीयौ त्रिकोटिनामा शिवायनः शास्त्रविदां वरेण्यौ । कृत्स्नश्रुतं श्रीगुरुपादमूले ह्यधीतवंतौ भवतः कृतार्थौ ॥ —विक्रान्तकौरव | १ 'स्वयं' से ' कीरण ' तकका पाठ कुछ अशुद्ध जान पड़ता है । * 'जैन सिद्धान्तभास्कर ' किरण १ ली, पृ० ३८ । २ यह पद्य ' जिनेन्द्र कल्याणाभ्युदय' की प्रशस्ति में भी पाया जाता है । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010669
Book TitleRatnakarandaka Shravakachara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherManikchand Digambar Jain Granthamala Samiti
Publication Year1982
Total Pages456
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy